Sunday, March 15, 2020

अब प्रेम न हो जीवन मे

स्वतंत्र रूप मन का प्रवाह करता है शोर किनारे,
प्रेम बना है अमर आज सहता था घोर किनारे,
कभी न टूटेे धागे मे आ गिर आयी चिङारी ,,,,
प्रबल पीर अनुभव मे आ फिर छाई अन्धियारी !!

गहरे मन की शोभा ने छीना फिर अधिकार हमारा,
चन्दन बन शीतल हो आया ह्र्दय पुकार हमारा,
कभी थी खाई सी गहराई कभी पाट आ छाया,
धीरज धूर्त ने उठा लिया मन का प्रकाश फिर सारा !!

अतुल् प्रेम का भ्रमण था मेरा , कहाँ पता क्या होगा,,
जिसकी दुनिया तुल्य बनी थी , कहाँ छितिज फिर होगा,,
दो पट रेखा साथ चली थी , दूरी स्वंय बनी थी,,
जिसका कल्पित नही हुआ फिर मिलन कहाँ से होगा !!

वेदना मेरी टपक रही है, कि फिर जीवन हो आए,,
लेकिन मन पर ठोस लगाया नही वो आगे जाए,,
जिसने छोड़ दिया है साथी हाथ अधूरे वन मे,
ईश्वर मेरी विनती सुनना, अब प्रेम न हो जीवन मे,
अब प्रेम न हो जीवन मे....!!!

ab prem na ho jeevan me


कवि - शिवम् तिवारीshivam tiwari kavi
शहर - प्रयागराज
ईमेल - shivam9532096168@gmail.com
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Gaurav Hindustani

My name is Gaurav Hindustani. I am web designer by profession, but I am author by heart so Hindustani Kranti is a platform for all Authors and poets who write GOLDEN words and have special stories and poetries. You can send any time your words to me at gauravhindustani115@gmail.com.

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