Wednesday, January 15, 2020

परम बुध्दिमति महिला | (Lord krishna) | Real devotee meaning

उन्नत अध्यात्म वादियों तथा आत्मा और पदार्थ में अंतर करने में सक्षम विचारकों के हृदय में भक्ति के दिव्य विज्ञान का प्रसार करने के लिए लेते हैं | तो भला फिर हम स्त्रियां  पूर्णरूपेण जान सकती हैं  ?

बड़े-बड़े तत्व ज्ञानी भगवान के धाम तक नहीं पहुंच पाते | उपनिषदों में कहा गया है परम ब्रह्मा बड़े से बड़े दार्शनिक की भी चिंतन शक्ति से परे हैं |  उन्हें बड़ी से बड़ी विद्या बड़े से बड़े मस्तिष्क द्वारा भी नहीं जाना जा सकता | उन्हें वही जान पाता है जिसे उनकी कृपा प्राप्त हो |  अन्य लोग वर्षों तक चिंतन करने के बाद भी उन्हें नहीं जान पाते |  इस तथ्य की पुष्टि महारानी कुंती द्वारा की जा रही है  जो एक अबोध महिला की भूमिका अदा कर रही है |  सामान्य स्त्रियां  दार्शनिकों की तरह चिंतन नहीं कर पाती  किंतु उन्हें भगवान से आशीष प्राप्त रहता है,  क्योंकि वे भगवान की तथा सर्वशक्तिमत्ता पर तुरंत विश्वास कर लेती हैं  और बिना किसी अनुभव के उन्हें नमस्कार करती हैं | भगवान इतने दयालु हैं कि  वे केवल ऐसे व्यक्ति पर कृपा नहीं करते जो बहुत बड़ा दार्शनिक होता है | प्रयोजन की निष्ठा को जानते हैं | यही  कारण है कि किसी भी धार्मिक उत्सव के अवसर पर  महिलाएं बड़ी तादाद में एकत्र होती हैं |  प्रत्येक  देश के प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय में पुरुषों की अपेक्षा  अधिक दिखती है | भगवान की सत्ता की स्वीकृति की यही सरलता निष्ठा विहीन धार्मिक दिखावे से कहीं अधिक प्रभावोत्पादक है |

कुन्ती देवी नहीं बहुत ही विनीत भाव से भगवान की प्रार्थना की जो कि  एक वैष्णव का लक्षण है | भगवान कृष्ण तो कुंती देवी के चरणों की धूल लेकर उनके प्रति आदर जताने आए थे | क्योंकि कृष्ण कुन्ती देवी को अपनी बुआ मानते थे,  अतएव  वे उनका चरण स्पर्श किया करते थे | यद्दपि कुंती देवी कृष्ण की माता यशोदा तुल्य पूजनीय थीं,  किंतु महान भक्त होने के कारण वे इतनी विनीत थी कि, उन्होंने प्रार्थना की, " हे कृष्ण !  तुम तो परमहंसों द्वारा ज्ञय  हो |  मैं तो एक अबला हूं तो भला मैं आपका दर्शन कैसे कर सकती हूं ? "

वैदिक प्रणाली के अनुसार 4 सामाजिक विभाग (वर्ण) हैं |  सामाजिक वर्णों में ब्राह्मण सर्वोपरि है,  क्योंकि वे सर्वाधिक बुद्धिमान हैं |  उसके बाद क्षत्रिय ( सैनिक वर्ग तथा राजन्य),  फिर वैश्य  (कृषक तथा व्यापारी)  और अंत में शूद्र (सामान्य मजदूर) आते हैं |  इस प्रणाली में मनुष्य के गुण तथा कर्म के अनुसार उसका स्थान निर्धारित होता है |  भगवद गीता में  स्त्रियों वैश्यास्त्था शूद्राः और श्रीमद्भागवत् में स्त्रीशुद्रद्विजबंधूनाम का उल्लेख आया है | 

इन निर्देशों के अनुसार स्त्रियां शूद्र तथा द्विजबंधु एक ही श्रेणी में आते हैं |  द्विजबंधु  उस व्यक्ति का सूचक है जो उच्च ब्राह्मण या क्षत्रिय कुल में उत्पन्न तो होता है,  किन्तु उसमे  उसके अपने गुण नहीं पाए जाते |  वैदिक प्रणाली के अनुसार मनुष्य का सामाजिक स्थान उसके गुण द्वारा निर्धारित होता है |  यह अत्यंत व्यावहारिक है | मान लीजिए कि कोई व्यक्ति उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के पुत्र रूप में जन्म लेता है तो इसका अर्थ यह नहीं होता है कि वह भी  उच्च   न्यायालय का न्यायाधीश है |  फिर भी यदि कोई ब्राह्मण कुल में उत्पन्न होता है उसमें कोई गुण नहीं पाए जाते और वह पहले दर्जे का धूर्त होता है तो भी वह अपने को ब्राह्मण कहलवाता है | उसके गुण शूद्र से भी न्यून होते हुए भी लोग उसे ब्राह्मण मानते हैं | इससे वैदिक सभ्यता का पतन हुआ है | 

 भारत में ब्राह्मण लोग कभी-कभी मेरे आंदोलन का विरोध करते हैं, क्योंकि मैं यूरोप तथा अमेरिका के लोगों को प्रशिक्षित करता तथा उन्हें ब्राह्मण मानता हूं  | किंतु हम ना तो उनके तर्कों की परवाह करते हैं, न ही कोई भी विवेक युक्त व्यक्ति करेगा |

पृथिवीते  आछे यत नगरादि ग्राम | 
सर्वत्र प्रचार हैबे मोर नाम | |

विश्व के प्रत्येक नगर प्रत्येक शहर प्रत्येक गांव में कृष्ण भावनामृत आंदोलन का प्रचार होगा |  तो भला यह कैसे हो सकता है  कि यूरोप वासी तथा अमेरिका वासी ब्राह्मण नहीं बनेंगे ?  वस्तुतः जो व्यक्ति कृष्ण भावनामृत अंगीकर करता है वह पहले ही ब्राह्मणत्व  से आगे बढ़ चुका होता है | 

" जो भक्ति योग स्वीकार करता है वह प्रकृति के गुणों को पार कर जाता है और तुरंत ही दिव्य पद को प्राप्त होता है|"   ब्राह्मण बनने की बात क्या,  ऐसा व्यक्ति परम पद को प्राप्त होता है | 

इस अंधविश्वास ने ,  ब्राह्मण कुल में उत्पन्न व्यक्ति ही ब्राह्मण बन सकता है,  वैदिक सभ्यता को मार डाला है, किंतु अब हम इस विचार को पुनर्जीवित कर रहे हैं कि प्रत्येक व्यक्ति सिद्धि प्राप्त कर सकता है  |

" हे पृथा पुत्र  !  जिन लोगों ने मेरी शरण ग्रहण कर रखी है वे भले ही निम्न जन्मा, स्त्रियाँ या शुद्र क्यों न हों,  परमधाम तक पहुंच सकते हैं |"  इस तरह यद्यपि स्त्रियां शुद्र तथा वैश्य निम्न वर्ग के माने जाते हैं किंतु भक्त हो जाने पर वह चाहे स्त्री हो या पुरुष,  ऐसी उपाधियों से परे चले जाते हैं |  सामान्यतया स्त्रियों, शूद्रों  तथा वैश्यों को अल्पज्ञ   माना जाता है | यदि कोई कृष्ण भावना मृत अंगीकार करता है तो वह सर्वाधिक बुद्धिमान बन जाता है |

(Lord krishna) | Real devotee meaning | chanting meaning



हरे कृष्णा हरे कृष्णा 
कृष्णा कृष्णा हरे हरे || 

हरे राम हरे राम 
राम राम हरे हर ||
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Gaurav Hindustani

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