Thursday, January 9, 2020

इन्द्रियों से परे | Bhagwat geeta | Lord Krishna | Senses meaning

माया जवनिकाच्छ्त्र मज्ञाधोक्षजमव्य्यम |
न लक्ष्यसे मूढ़दृशा नटो नाट्यधरो यथा ||


सीमित इंद्रिय ज्ञान से परे होने के कारण आप ठगिनी शक्ति ( माया ) के परदे से ढके रहने वाले शाश्वत अविनाशी तत्व हैं |  आप मूर्ख दर्शक के लिए उसी तरह लक्ष्य रहते हैं जिस तरह अभिनेता की वेशभूषा बना लेने पर नट ( कलाकार )  पहचान में नहीं आता |

भगवदगीता में भगवान श्री कृष्ण (Lord Krishna) इसकी पुष्टि करते हैं अल्पज्ञ व्यक्ति उन्हें अपने जैसा सामान्य व्यक्ति समझने की भूल कर बैठते हैं और इस तरह भी उनका उपहास करते हैं | श्रीमती कुंती ने भी इसी की पुष्टि यहां की है | अल्पज्ञ व्यक्ति वह है जो भगवान की सत्ता के विरुद्ध उपद्रव मचाते हैं |  ऐसे व्यक्ति असुर कहलाते हैं |  जब भगवान हम लोगों के  बीच  राम,  नरसिंह, वराह या अपने आदि कृष्ण रूप में प्रकट होते हैं तो वे ऐसे अनेक अद्भुत कार्य करते हैं जो मनुष्य के लिए असंभव है | जैसा कि हम श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध में देखेंगे,  भगवान श्रीकृष्ण मानव मात्र के लिए असंभव कार्यों को तभी से करने लगे थे जब वे अपनी माता की गोद में लेटे रहते थे | उन्होंने उस पूतना चुड़ैल का वध किया जो कि उन्हें मार डालने के लिए अपने स्तनों में विष लगा कर आई थी |  भगवान ने बालक की तरह उसका स्तनपान किया और उसके प्राण तक चूस लिए |  इसी तरह उन्होंने गोवर्धन पर्वत को उठा लिया जैसे कोई बच्चा कुकुरमुत्ता को उखाड़ ले |  वृंदावन के वासियों को शरण देने के लिए 7 दिनों तक पर्वत उठाए खड़े रहे |  भगवान के इन गिने-चुने अमानवीय कार्यकलापों का वर्णन पुराणों, इतिहास तथा उपनिषदों में हुआ है |  उन्होंने भगवदगीता के रूप में अद्भुत उपदेश दिया है |  उन्होंने एक नायक, एक गृहस्थ  एक शिक्षक तथा एक त्यागी के रूप में अद्भुत क्षमताओं का प्रदर्शन किया है |  व्यास,  देवल,  असित,  नारद,  मध्व,  शंकर,  रामानुज,  श्री चैतन्य महाप्रभु,  जीव गोस्वामी,  विश्वनाथ चक्रवर्ती,  भक्ति सिद्धांत सरस्वती तथा उस परंपरा के अन्य प्रामाणिक पुरुषों ने उन्हें भगवान के रूप में स्वीकार किया है |  स्वयं भी उन्होंने प्रामाणिक साहित्य में अनेक स्थलों पर अपने को भगवान घोषित किया है |  फिर भी आसुरी मनोवृति वाला एक ऐसा वर्ग है  जो उन्हें परब्रह्मा परमेश्वर के रूप में मानने से हिचकिचाता है |  ऐसा कुछ तो उनकी अल्पज्ञता के कारण है तो कुछ उनकी घोर मूढ़ता के कारण है  जो उनके विगत तथा वर्तमान दुष्कर्म से उत्पन्न होती है  |  ऐसे लोग श्रीकृष्ण को तब भी नहीं पहचान पाए जब वे उनके समक्ष उपस्थित थे |  दूसरी कठिनाई यह है  कि जो लोग अपनी पूर्ण इंद्रियों पर अधिक निर्भर रहते हैं  वे उन्हें परमेश्वर के रूप में अनुभव नहीं कर पाते |  ऐसे व्यक्ति आधुनिक विज्ञानियों जैसे हैं  जो अपने प्रयोगात्मक ज्ञान से हर बात को जानना चाहते हैं |  किंतु अपूर्ण प्रयोगात्मक ज्ञान से परम पुरुष को जान पाना असंभव है |  यहां पर उन्हें अधीक्षक  अर्थात प्रयोगात्मक ज्ञान की परिधि से परे बतलाया गया है |  हमारी सारी इंद्रियां अपूर्ण है |  भले ही हम यह दावा करते हैं कि  हम हर किसी वस्तु को देख सकते हैं  किंतु हमें यह स्वीकार करना होगा  कि हम वस्तुओं को किन्ही ऐसी परिस्थितियों में  ही  देख सकते हैं  जो हमारे वश में नहीं होती |  भगवान इंद्रिय अनुभूती द्वारा देखे जाने से परे हैं |  महारानी कुंती बद्धजीव की और विशेष रूप से अल्पज्ञ स्त्री जाति की इस न्यूनता को स्वीकार करती हैं |  अल्पज्ञ लोगों के लिए मंदिर,  मस्जिद या गिरजा घरों की आवश्यकता होती है  जिससे भगवान की सत्ता को पहचाने और ऐसे पवित्र स्थलों में जाकर भगवान के विषय में अधिकारियों से श्रवण कर सकें |  अल्पज्ञ के लिए आध्यात्मिक जीवन की यह शुरुआत आवश्यक है |  केवल मूर्ख लोग ही इन पूजा स्थलों की जिनकी आवश्यकता जनता में आध्यात्मिक गुणों के स्तर को ऊपर उठाने के लिए होती है,  स्थापना करने का विरोध करते हैं |  अल्पज्ञ के लिए मंदिरों,  मस्जिदों या गिरजा घरों में जाकर भगवान की सत्ता के समक्ष नतमस्तक होना उतना ही लाभप्रद है जितना की भागवत के लिए सक्रिय सेवा द्वारा भगवान का ध्यान करना | 

इन्द्रियों से परे | Bhagwat geeta | Lord Krishna | Senses meaning



हरे कृष्णा हरे कृष्णा 
कृष्णा कृष्णा हरे हरे || 

हरे राम हरे राम 
राम राम हरे हर ||


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Gaurav Hindustani

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