Sunday, January 19, 2020

एकलव्य की कहानी | गुरुद्रोणाचार्य सही या गलत ? | Ekalavya story

भगवान् श्री कृष्ण के परम भक्तों, देशभक्तों तथा भारत की संस्कृति को संजोने वाले प्रिय युवाओं, आप सभी ने एकलव्य और गुरु द्रोणाचार्य की कहानी ( हाँ , वही कहानी जिसमें गुरूजी अपने शिष्य एकलव्य से गुरुदक्षिणा में अंगूठा मांग लेते हैं  ) अवश्य सुनी होगी | परन्तु इस कहानी को पढ़ने के बाद हमेशा हमारे दिमाग में प्रश्नों का भँवर उठ जाता है |  आखिर गुरु द्रोणाचार्य ने क्यों किया ऐसा ? जबकि एकलव्य ने धनुर विद्या उनसे तो नहीं सीखी बल्कि उसने अपने परिश्रम और लगन से सीखी | उसने तो बस गुरु की प्रतिमा को समक्ष रखके ही तो अभ्यास किया था | फिर क्या हक़ बनता है गुरु द्रोणाचार्य की गुरु दक्षिणा का ? और यदि एकलव्य की महानता के कारण वह गुरुदक्षिणा के लिए कहता भी है फिर क्या आवश्यकता थी उसका अंगूठा माँगने की ? कितने निर्दयी और अन्यायी गुरु थे ..? 

ऐसे ही अनगिनत प्रश्न हमारा मन अक्सर पूछा करता है, परन्तु उनके हल कहाँ मिलते हैं | क्या ये कहानी पूर्णतया सत्य है ?

प्रिय पाठकों, 
हाँ, ये कहानी पूर्णतया सत्य नहीं है | हाँ ...आपको जानकर आश्चर्य अवश्य हुआ होगा | परन्तु सत्यता यही है कि ये कहानी मूढ़ लोगों ने गलत अर्थ तथा गलत व्याख्या के साथ प्रस्तुत की है जिसके परिणामस्वरूप गुरु जैसे पवित्र चरित्र पर दाग लग गया | जरा सोचिये जिस गुरु को सनातन धर्म ने ईश्वर से भी उच्च स्थान दिया फिर भला गुरु ऐसा अन्याय, ऐसा अनर्थ कैसे कर सकता है और यदि ऐसा किया भी होगा तो कोई तो कारण, कोई तो प्रयोजन रहा होगा |  
आज आपको यहाँ मैं उस कहानी का पूर्णसत्य और वास्तविक चित्र प्रस्तुत कर रहा हूँ  |

एकलव्य की कहानी | गुरुद्रोणाचार्य सही या गलत ? | Ekalavya story


गुरुद्रोणाचार्य अपने शिष्यों के साथ आ रहे थे कि उनकी नज़र ऐसे योद्धा पर पड़ी जो धनुर विद्या में निपुण था उसने एक कुत्ते पर बाण चलाया और उसका मुँह खुला रह जाता है परन्तु उसे तनिक भी चोट नहीं पहुँचती है उसकी इस विद्या को देख द्रोणाचार्य ने उस योद्धा से परिचय जानना चाहा | एकलव्य ने गुरु द्रोणाचार्य को देखते ही उनके चरण स्पर्श किये और अपना परिचय दिया | 
द्रोणाचार्य - वत्स, तुम्हारी धनुर्विद्या का दृश्य हम देख चुके हैं, तुम धनुर्विद्या में कुशल योद्धा हो, तुम्हारे गुरु कौन हैं ? तुमने ये विद्या किस्से सीखी ?
एकलव्य - मेरे गुरु तो आप ही है, ये विद्या मैंने आपसे ही तो सीखी है | 
द्रोणाचार्य आश्चर्य से - परन्तु मैंने तो कभी तुम्हे धनुष - बाण के बारे में तक नहीं बताया फिर ..फिर मैंने कैसे ?
एकलव्य - गुरुदेव, मैंने आपको ही अपना गुरुदेव मान लिया और आपकी प्रतिमा को समक्ष रख ये धनुर्विद्या सीखी |
द्रोणाचार्य - इस धनुर्विद्या को सीखने का कोई विशेष प्रयोजन ?
एकलव्य - हाँ, गुरुदेव मैं अपने शत्रु अर्जुन को हराना चाहता हूँ | 
फिर द्रोणाचार्य एकलव्य की मनोदशा समझ गये कि एकलव्य अर्जुन से घृणा करने लगा था और यदि वह एक कुशल धनुर्धर हो गया तब महाभारत के युद्ध में वह अधर्मी कौरवों से सन्धि कर लेगा और अधर्म पर चलेगा | इसी अनर्थ को बचाने के लिए आगे गुरु द्रोणाचार्य ने एकलव्य से कहा | 

एकलव्य तुमने मुझे गुरु मान लिया है तो फिर मेरी गुरु दक्षिणा भी देनी होगी ?
एकलव्य ने प्रसन्नचित्त होकर कहा - जी गुरुदेव, आप कहिये मैं क्या सेवा करूं आपकी और क्या दे सकता हूँ आपको ?
गुरु द्रोणाचार्य - मुझे, वचन दो कि कभी युद्ध क्षेत्र में धनुष को हाथ नहीं लगाओगे ..|
एकलव्य गुरु की बात सुनकर सन्न रह जाता है और बहुत दुखी होता है वह कहता --
"गुरुदेव आपने तो मेरा अंगूठा ही मांग लिया |"

हाँ यह वाक्य एक मुहावरे की तरह है | इसका तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि उन्होंने अंगूठा काट के देने के लिए कहा | परन्तु लोगों ने इसका अर्थ न जाने क्या - क्या लिख दिया | एकलव्य वचन देता है कि वह कभी किसी युद्धक्षेत्र में  धनुष को हाथ नहीं लगाएगा | 

और इस कहानी को पढ़कर सबसे ज्यादा वर्तमान दलित प्रभावित होते हैं, वो कहते हैं कि एकलव्य दलित था इसलिए उसे आगे नहीं बढ़ने दिया जो कि सिर्फ़ और सिर्फ़ असत्य है | 

प्रिय पाठकों, भारतीय संस्कृति का प्रत्येक ग्रन्थ, साहित्य, वेद - पुराण आदि में गूढ़ रहस्य है जिसको समझना जटिल है और अज्ञानतावश कुछ का कुछ अर्थ निकाल लेते हैं | और बाद में ग्रंथो को, पुरानी सभ्यता को दोष देते हैं |  ऐसी ही गूढ़ रहस्य को पढ़ने के लिए हिन्दुस्तानी क्रान्ति का हिस्सा बने रहिये तथा सनातन धर्म का प्रचार करते रहिये | 

हरे कृष्णा हरे कृष्णा 
कृष्णा कृष्णा, हरे हरे 

हरे राम हरे राम 
राम राम, हरे हरे 
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Gaurav Hindustani

My name is Gaurav Hindustani. I am web designer by profession, but I am author by heart so Hindustani Kranti is a platform for all Authors and poets who write GOLDEN words and have special stories and poetries. You can send any time your words to me at gauravhindustani115@gmail.com.

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