Saturday, June 1, 2019

उन्नति के तीन गुण

हम निरन्तर उन्नति की ख़ोज में दौड़ते रहते हैं, परन्तु यह उन्नति है कि हाथ नहीं आती | आखिर क्यों हमे उन्नति प्राप्त नहीं होती ? कहाँ कमी रह जाती है ? इसका एक कारण यह भी है कि हम अंधेरे में तीर से छोड़ देते हैं लग गया तो ठीक वरना सारे कार्य व्यर्थ | यदि वास्तविक रूप में उन्नति करनी है तो हमे उन्नति के ये गुणों को पढ़ना होगा, समझना होगा तथा अपने जीवन में उतारना होगा | 
1. आत्मबल (Will Power)
2. आत्मविश्वास (Self Confidence)
3. आत्मनिर्भरता (Self Reliance)

अब एक-एक कर इन सभी गुणों के गूढ़ ज्ञान को समझते हैं | 
1. आत्मबल (Will Power) : सर्वोपरि सर्वसमर्थ बल का नाम है - आत्मबल | आत्मबल के अभाव में सारी भौतिक सामर्थ्य तथा उपलब्धियां केवल भार बनकर रह जाती हैं | केवल बलवान होना ही काफी नहीं, बल का सही दिशा में सदुपयोग होना ही वह कौशल है, जिसके आधार पर समर्थता का लाभ उठाया जा सकता है | अपव्यय अथवा दुरुपयोग से तो बहुमूल्य साधन भी निरर्थक ही नहीं हानिकारक तक बन जाते हैं | अतएव धन, बुद्धि, स्वास्थ्य आदि शक्तियों के ऊपर नियन्त्रण करने और उन्हें सही दिशा में प्रयुक करने वाली एक केन्द्रीय समर्थता भी होनी चाहिए | कहना न होगा कि इस समर्थता का नाम आत्मबल है | 

आत्मबल
आत्मबल


हमे जानना चाहिए कि मनुष्य केवल एक शरीर मात्र ही नहीं है | उसमे एक परम तेजस्वी आत्मा भी विद्यमान है | हमे जानना चाहिए कि मनुष्य केवल धन, बुद्धि और स्वास्थ्य के भौतिक बलों से ही सांसारिक सुख, सम्पदा, समृधि एवं प्रगति प्राप्त नहीं कर सकता, उसे आत्मबल की भी आवश्यकता है | आत्मा के अभाव में शरीर की कीमत दो कौड़ी की भी नहीं रहती | इसी प्रकार आत्मबल के अभाव में शरीर बल मात्र खिलवाड़ बनकर रह जाता है | वह किसी के पास कितनी ही बड़ी मात्रा में क्यों न हो, उससे सुखानुभूति नहीं मिल सकती | वे केवल भार, तनाव, चिंता एवं उद्वेग का कारण बनेंगे और यदि कहीं उनका दुरुपयोग होने लगा, तब तो सर्वनाश की भूमिका ही सामने लाकर खड़ी कर देंगे | 

आदर्शों और सिद्धान्तों पर अड़े रहने, किसी भी प्रलोभन और कष्ट के दबाव में कुमार्ग पर पग न बढ़ाने, अपने आत्मगौरव के अनुरूप सोचने और करने, दूरवर्ती भविष्य के निर्माण के लिए आज की असुविधा को धैर्य और प्रसन्नचित्त से सह सकने की दृढ़ता का नाम आत्मबल है | जो वासना और तृष्णा को, स्वार्थ और सुविधा को ठोकर मारकर अपने लिए नहीं, लोकमंगल के लिए सदाचार से भरा प्रेम और आत्मीयता भरा जीवन जी सकता है, उस महामानव को ही आत्मबल सपन्न कहा जायेगा | चरित्र के धनी, करुणा, दया से परिपूर्ण ह्रदय, उदारता और आत्मीयता से ओत-प्रोत व्यक्तित्व आत्मबल के ही प्रतीक हैं | 

सत्याग्रही, शहीद इसी श्रेणी में आते हैं | गाँधी के सत्याग्रही लाठी खाते रहे, पर एक-एक कर आगे आए, झण्डे को झुकने नही दिया, सीने पर गोलियाँ खाई, जेल भरते चले गये और अंततः अनाचारी शासन को विवश कर दिया कि वह देश को स्वतंत्रता वापस दे | शिवाजी के छापामार अपनी नीति में पूरी सफल रहे | संख्या बल में थोड़े वे कैसे सोचते कि अपने शत्रु से जूझ पाएंगे, पर न केवल उन्होंने उस नीति से पश्चिमी घात के अनेक किले जीते, खण्ड-खण्ड में टूटे भारत की संघर्ष की एक शिक्षा भी दी | 

2. आत्मविश्वास (Self Confidence) : संसार के समस्त अग्रणी लोग आत्मविश्वासवर्ग के होते  हैं | अपनी आत्मा में,  अपनी शक्तियों में आस्थावान रहकर कोई भी कार्य कर सकने का साहस रखते हैं और जब भी जो कार्य अपने लिए चुनते हैं, पूरे संकल्प और पूरी लगन के साथ उसे पूरा करके छोड़ते हैं | वे मार्ग में आने वाली किसी बाधा अथवा अवरोध से विचलित नहीं होते | आशा, साहस, उद्योग उनके स्थायी साथी होते हैं | किसी भी परिस्तिथि में वह उनको पास से जाने नहीं देते | आत्मविश्वासी सराहनीय कर्मवीर होता है | वह अपने लिए ऊँचा उद्देश्य चुन ही लेता है | हेयता, दीनता अथवा निकृष्टता उसके पास भटकने नहीं पाती | नित्य नए उत्साह से अपने कर्तव्य पथ पर अग्रसर होता है, नए-नए प्रयत्न और प्रयोग करता हिया, प्रतिकूलताओं और प्रतिरोधों से बहादुरी के साथ टक्कर लेता और अंत में विजयी होकर श्रेय प्राप्त कर ही लेता है |
आत्मविश्वास में वह ताक़त हैं, जो हजार विपत्तियों का सामना कर, उन पर पूरी-पूरी विजय प्राप्त कर सकती है | यही मनुष्य का सच्चा मित्र और उसकी सबसे बड़ी पूँजी है | हमने देखा है कि साधनहीन होने पर भी आत्मविश्वासी मनुष्यों ने दुनिया में गजब के काम किये हैं, जबकि बहुत से साधन सम्पन्न व्यक्ति विश्वासहीनता के कारण बुरी तरह से असफल होते हैं |
निसंदेह हर परिस्तिथि में मनुष्य का एक मात्र साथी उसका अपना आपा ही है | स्वामी विवेकानन्द के शब्दों- "आत्मविश्वास के कारण दुर्गम पथ भी सुगम बन जाते हैं, बाधाएँ भी मंजिल पर पहुँचाने वाली सीढ़ियाँ बन जाती हैं |" एमर्सन ने कहा है, "आत्मविश्वास सफलता का मुख्य रहस्य है |"
आत्मविश्वास के सन्दर्भ में कुछ महान विभूतियों के विचार :- 
जो आत्मा से ही परिचित नहीं, उसमें आत्मविश्वास कैसे हो सकता है ? - वेदान्त तीर्थ
सच्चा आत्मविश्वास पर्वतों को भी हिला सकता है - महात्मा गाँधी
आप अन्य चाहे जिस पर शक करें, स्वयं पर कदापि न करें - गोर्की
आत्मविश्वास सफलता का प्रथम रहस्य है - इमर्सन


आत्मविश्वास
आत्मविश्वास


3. आत्मनिर्भरता (Self Reliance) : अपने ऊपर विश्वास करना, अपनी शक्तियों पर विश्वास करना एक ऐसा दिव्य गुण है जो हर कार्य को करने योग्य साहस, विचार एवं योग्यता उत्पन्न करता है | दूसरों के ऊपर निर्भर रहने से अपना बल घटता है और इच्छाओं की पूर्ति में अनेक बाधाएँ उपस्थित होती हैं | स्वाधीनता, निर्भयता और प्रतिष्ठा इस बात में है कि अपने ऊपर निर्भर रहा जाए, सफलता का सच्चा और सीधा पथ यही है | आत्मनिर्भरता तथा आत्मविश्वास ऐसे दिव्य गुण हैं कि जिनको विकसित कर लेने पर संसार का कोई भी कार्य कठिन नहीं रह जाता है | यदि आप जीवन में सफलता, उन्नति, सम्पन्नता एवं समृद्धि चाहते हैं, तो स्वावलंबी बनिए | अपना जीवन पथ ख़ुद अपने हाथों प्रशस्त कीजिये और उस चलिए भी अपने पैरों से |
सामन्य स्थिति से ऊपर उठने के लिए हर व्यक्ति को प्रचुर मात्रा में स्वतंत्रता विधाता द्वारा प्राप्त है | समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी बहादुरी - ये चार विभूतियाँ ऐसी हैं, जिनका सदुपयोग, सुनियोजन कर हर व्यक्ति प्रगति की दिशा में आगे बढ़ता रह सकता है, वस्तुतः ये आत्म उन्नति के चार चरण हैं | इन्हें अपनाने के लिए हमे जागरूकता, तत्परता और तन्मयता निरन्तर प्रयत्नरत रहना चाहिए |

आत्मनिर्भरता
आत्मनिर्भरता


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Gaurav Hindustani

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