Saturday, June 1, 2019

पुरुष की सोच और परम्पराओं का बोझ

आज हर नारी की सोच यही है कि नारी की समस्याओं के लिए नारी को ही आगे आना होगा, क्योंकि पुरुषों के बनाए तानाशाही दमनकारी नीतियों की मुहाफिज किसी न किसी रूप में नारियां ही होती हैं। नारी की दयनीय स्थिति को परम्पराओं तले दबा कर देवी बना दिया जाता है घुट घुट कर मरने के लिए छोड़ दिया जाता है, और नारी भी इस सच्चाई को जानते हुए विकृत संस्कार और संस्कृति को सहर्ष स्वीकार कर जीवन भर अपनी किस्मत को कोसती रहती है.. | 
पर कहीं न कहीं ये बात भी उतना ही महत्व रखती है कि जब तक पुरूष अपनी सोच और परम्पराओं का बोझ नही बदलेगा और पुरुष नारी का सम्मान नही करेंगा..| जब तक पुरूष को आत्मग्लानी नही होगी कि वह नारी के साथ गलत कर रहा तब तक कुछ नही होने वाला..| सज़ा के डर से गुनहा कम होते हैं पर होते हैं.. विचारो का परिवर्तन आवश्यक है... गर हर पुरूष गुनहा करने से पहले एक पल ये सोच ले या पीछे मूड कर देखे घर में हमारी माँ हैं,बहन है ...और वो माँ का सम्मान करता है तो उनकी छवि अन्य महिला में देख उनका सम्मान करें.. तभी समाज बदल पायेगा... उन पुरूषों पर तरस आता है जो विकृत बुद्धि वाले हैं जिनका इलाज नही हो सकता उन्हें ज़हर दे देना चाहिए या सरे आम सड़को पर फांसी दे देनी चाहिए ताकि बाकी जिनकी ऐसी गलत सोच है वो भी सुधर जाए.. जो ना सुधरें वो अंजाम के लिए तैयार रहे... नारी तो जाग गई है अपनी रक्षा करना सीख रही हैं.. संस्कारो की बेडी तोड़ कर वह अपने स्वाभिमान की रक्षा करेगी ..पुरुष मरने के लिए तैयार हो जाए ... अपनों के लिए प्रेम का दांव खेला जाए तो रामायण लिखी जाएगी वरना जर, ज़मीन, जोरु की लड़ाई तो महाभारत का रूप लेती है... फैसला हमारे हाथ में हैं कि हम अपनी आने वाली पीढी को क्या देना चाहते.. ?

पुरुष की सोच और परम्पराओं का बोझ-प्रिया बतरा
पुरुष की सोच और परम्पराओं का बोझ-प्रिया बतरा

Priya Batra 
    (Nagpur)
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Gaurav Hindustani

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