Monday, June 10, 2019

"मायका"

सुविख्यात लेखिका 
अमृता प्रितम जी ने *मायके* पर क्या खूब लिखा है:
रिश्ते पुराने होते हैं 
पर "मायका" पुराना नही होता 
उस  देहरी को छोडना आसान नही होता।

पर कुछ अपवाद भी हैं देखें 
शायद कुछ लोग सहमत नहीं होंगे 
कुछ के घाव हरे हो जाएंगे|   
                  "मायका"
किसी मकान को घर कहे ज़माना हो गया 
रिश्ते तो रिश्ते मायका भी पुराना हो गया 
सुना था अलाये बलाये निकाली जाती हैं 
पर हकीकत, अचानक कैसे आयी ये निगाहे बोल जाती
जिस घर का कोना कोना यादों से भीगा होता 
उसी घर में,कहीं कोने में बैठ पानी पीना होता 
वो बचपन के नखरे,रंगीन कटोरी, छोटी ग्लासी 
आज पसंद की कटोरी टूटी देख आये उदासी
पूरे घर में लिपस्टिक,नेलपेंट बिखेरती
आज पर्स का सामान पर्स में रखती
ऐसा नहीं के कुछ कोई लूट ले जाएगा
हां पर माँ कहेगी..रख ले तेरा कुछ छूट जाएगा
वो क्या जाने छूट गया सब कुछ अब क्या लूट जाएगा
छोटी सी बात पर चीख चीख कर शोर मचाती
मुस्कुराए लब,आँखों में आंसू, दिल में दर्द छुपाती
वो ज़िद्द,एक कपड़ा चुनने में घंटो लगाती
आज पल में सबसे कम दाम का उठाती
जब कोई सामान दें माता पिता 
कह देती मुझे नही भाता
जिस घर से दूर होने का विचार ही रूला जाता 
वही बैठने पर घड़ी का कांटा सताता
एक ज़माने में सिर्फ हमारा नखरा चलता 
अब कहते हैं हमारे घर ये नहीं चलता 
बाहर जाते वक़्त मां कहती थी बेटा जल्दी आना 
अब कहती है पहले अपना घर संभालना
कभी हमारी चुलबुली बातों से घर में रौनक छा जाती
वक़्त यूं बदला, जब आती भाषण सुनाती
बचपन में जब दौड़ते भूकंप आता हुडदंग मच जाता
वही आज अदब से चलती तिनका भी बचाती
महलों से उठाकर फेक दिया गलियों में 
अब खुद उस गली में उन्हें गंध है आती
मां बच्चों के लिए दुनिया से लड़ जाती
आज बात बात पर शिकायत दर्ज़ कर जाती
सुना था बच्चे मां पिता के लिए बड़े नहीं होते
मायका पुराना नही होता 
रिश्ते तो रिश्ते मायका पुराना हो गया 
बेगाना हो गया |

आज भी बहोत सी बेटियों के जीवन की सच्चाई है.. 
विडंबना तो ये है कि मायके में पराया धन कहलाती है और ससुराल में कभी अपनाई नही जाती.. पराये घर से आई कहा जाता है.. कोई ये बता दे की बेटियों का घर कौन सा है 
यह एहसास दिल को झिंझोड़ता है;क्योंकि लगभग सभी ज़गह यही दास्तां है...माँ-बाप को ऐसी दकियानूसी सोच से मुक्ति पानी होगी।उनकी जिम्मेदारी सिर्फ़ बेटी की शादी तक नहीं है;बल्कि ताउम्र उसके साथ खड़ा होना है...मानसिक,आर्थिक,सामाजिक...सभी प्रकार के संबल के साथ...ताकि बेटी इस निर्दयी समाज में अपने आप को एक पल की ख़ातिर भी अकेला महसूस न करे। काश! हर माता पिता ऐसा सोचते...  आर्थिक मदद करें या न करें पर... मानसिक तौर पर हमेशा साथ खड़े रहना चाहिए...
 "मायका"
 "मायका"
Priya Batra
(Nagpur)
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Gaurav Hindustani

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