Monday, June 10, 2019

"क्या यही है समाज और सामाजिकता "

आज हमें महिलाओं को उसकी असीम अधिकार और क्षमताओं का बोध् कराना होगा और महिलाओं को स्वयं अपनी अस्मिता को पहचानना होगा। ऐसा माना जाता है कि कोई समाज महिलाओं की उपेक्षा करके प्रगति नहीं कर सकता। हमारे प्रथम राष्ट्रपति श्री राजेन्द्र प्रसाद का कथन है - स्त्री के भीतर छिपी परिवर्तनकारी ऊर्जा पृथ्वी को स्वर्गतुल्य बना सकती है। महिलाओं के प्रति बढ़ते हुए अत्याचार हमारी मध्ययुगीन मानसिकता को उजागर करते है। हमें अपनी सोच बदलनी होगी। महिलाएं हमसे किसी मामले में कमतर नहीं हैं,को कभी नकारा नहीं जा सकता है।कुछ राजनीतिक दल महिलाओ के लिए  आरक्षण की माँग करते है मगर चुनाव आते ही टिकट देने मे पीछे हट जाते है। उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी ठीक ढंग से ना देना ये क्या बताता है एक तरफ महिलाओ की आरक्षण की माँग करना, दुसरी तरफ राजनीतिक हिस्सेदारी ना देना ये जो दोहरा चरित्र है बड़ा ही विचित्र है।महिलाएं एक दिन में पुरुषों की तुलना में छ: घण्टे अधिक कार्य करती हैं। आज विश्व में काम के घण्टों में 60 प्रतिशत से भी अधिक का योगदान महिलाएं करती हैं जबकि वे केवल एक प्रतिशत सम्पत्ति की मालिक हैं।महिलाओं के लिए नियम-कायदे और कानून तो खूब बना दिये हैं किन्तु उन पर हिंसा और अत्याचार के आंकड़ों में अभी तक कोई कमी नहीं आई है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 15 से 49 वर्ष की 70 फीसदी महिलाएं किसी न किसी रूप में कभी न कभी हिंसा का शिकार हो होने वाले अत्याचार के लगभग 1.5 लाख मामले सालाना दर्ज किए जाते हैं जबकि इसके कई गुण दबकर ही रह जाते हैं। विवाहित महिलाओं के विरूद्ध की जाने वाली हिंसा के मामले में बिहार सबसे आगे है जहां 59 प्रतिशत महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकार हुई। उनमें 63 प्रतिशत शहरी क्षेत्रों की थी।समाज के कुछ मनचले ही दुष्कर्म जैसे जघन्य अपराधों को अंजाम देने से बाज नहीं आते हैं। ऐसे लोगों को समाज द्वारा ही सजा देनी चाहिए, क्योंकि कानून से बचने के सारे उपायों को यह जानते हैं। और कानून का उनको कोई डर भी नहीं होता है।कई लोग, नेता और समाज के बुद्धजीवी लोग मानते हैं कि लड़कियों को जींस नहीं पहननी चाहिए, अकेले नहीं जाना चाहिए और जल्दी घर आ जाना चाहिए। इन्हीं कारणों से उनके साथ दुष्कर्म होता है। मैं पूछती हूं कि क्या लड़कियों इन सब की आजादी नहीं है? लड़कियों के साथ दुष्‍कर्म होना उनकी दैनिक दिनचर्या नहीं, बल्कि हमारी छोटी सोच इसके लिए जिम्मेदार है।
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Gaurav Hindustani

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