Monday, June 3, 2019

ईश्वर (God)

ईश्वर के प्रति हमारा नजरिया क्या है ? (What is our view of God?) क्या ईश्वर से माँगना ही धर्म है ? (Is it a religion to ask God?) हम ईश्वर को क्या दे सकते हैं ?  What can we give to God? ईश्वर हमसे क्या चाहता है ?  (What does God want from us? ) कैसे पा सकते हैं हम ईश्वरको ? (How can we find God?)

ईश्वरत्व मानवता के उत्कर्ष के साक्षत्कार का साधन मात्र है | जिसे ईश्वर की अनुभूति हो जाती है उसका हृदय दया, करुणा तथा सेवा भावना से सराबोर हो जाता है | - मैथिलीशरण गुप्त 

⇨ ईश्वर कोई बाह्य सत्य नहीं है | वह तो स्वयं के ही परिष्कार की अन्तिम चेतना अवस्था है | उसे पाने का अर्थ स्वयं वही हो जाने के अतिरिक्त और कुछ नहीं है | - आचार्य रजनीश 

⇨ वास्तविक राम कोई आदमी नहीं है जो कि कहीं अन्यत्र रहता हो और बुलाने पर आजाये  | चूँकि राम कोई और नहीं अपितु निजात्मा है | इसलिए राम नाम रटना नहीं है अपितु निज को जानना है, चूँकि निज का बोध ही असली राम की उपलब्धि है | - आधुनिक वेदव्यास 

⇨ साक्षी स्वरुप आत्मा को ज्ञान की आँखों से अपने मन में ही समझकर देखे | चूँकि साक्षी स्वरुप आत्मा का साक्षात्कार किये बिना संसार का जन्म-मरण रुपी झगड़ा छूट नहीं सकता | - संत कबीर 

⇨ ईश्वर प्रत्येक व्यक्ति को सच और झूठ में एक को चुनने का अवसर देता है | - इमर्सन 

⇨ ईश्वर एक वृत्त है, जिसका केंद्र तो सर्वत्र है, किन्तु वृत्त रेखा कहीं नहीं | - संत आगस्टाइन 

⇨ जो पुरुष स्वयं को शरीर , प्राण, इन्द्रिय और मन नहीं मानकर साक्षीस्वरुप में स्थित एकमात्र शिव रूप परमात्मा ही समझते हैं, उनकी ऐसी निश्चयात्मक बुद्धि ही समाधि कहलाती है | - अन्नपुर्नौप्निषद 

⇨ यदि ईश्वर है तो हमे उसे देखना चाहिए, यदि आत्मा है तो हमे उसकी प्रत्यक्ष अनुभूति कर लेनी चाहिए अन्यथा उन पर विश्वास न करना ही अच्छा है | ढोंगी बनने की अपेक्षा स्पष्ट रूप से नास्तिक बनना अच्छा है | - स्वामी विवेकानन्द

⇨ प्रभु को समर्पित करने योग्य मनुष्य के पास "मैं" के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है | शेष जो भी वह छोड़ता है वह केवल छोड़ने का भ्रम है | क्योंकि वह उसका था ही नहीं | - आचार्य रजनीश 

⇨ क्या ईश्वर है ? ईश्वर ही ईश्वर है - सभी कुछ वही है, लेकिन जो "मैं" से भरे हैं, वे उसे नहीं जान सकते | उसे जानने की पहली शर्त स्वयं को खोना है | - आचार्य रजनीश

⇨ जिसकी पीठ पर परमेश्वर का हाथ हो उसके लिए कुछ भी कठिन नहीं | भगवान जो चाहे कर दे उसका हाथ कौन पकड़ सकता है | - सुदर्शन 

⇨ भगवान् को सभी मनुष्यों के साथ एक समान प्रेम है लेकिन अधिकतर लोगों के चेतना का धुंधलापन उन्हें इस दिव्य प्रेम को देखने से रोकता है | - माता पाण्डिचेरी

⇨ अनुकूलता प्रतिकूलता को मत देखो, जिस प्रभु ने उनको भेजा है, उस प्रभु को देखो और उसी को अपना मानकर प्रसन्न रहो | - स्वामी रामसुख दास 

⇨ ईश्वर कण-कण में है, वह सर्वव्यापी है | इस कथन का आश्रय सिर्फ़ इतना है कि आप ईश्वर को हमेशा मौजूद मानें | - स्वामी शिवानन्द 

⇨ परमात्मा को बाहर मत ढूंढ़ों | परमात्मा कोई आदमी नहीं है, जो तुम्हे बाहर मिल जायेगा | चित्तवृत्ति निर्विशेष होने पर जहाँ होती है और सविषयता से पूर्व जहाँ थी वही परमात्मा है - आधुनिक वेदव्यास 

⇨ मेरे लिए इस बात का महत्व नहीं कि  ईश्वर मेरे पक्ष में है या नहीं | मेरे लिए अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि मैं ईश्वर के पक्ष में रहूँ क्योंकि ईश्वर हमेशा सही होता है | - अब्राहम लिंकन 

⇨ परमात्मा व्यक्ति नहीं, उसका साक्षात्कार नहीं हो सकता | परमात्मा शक्ति है लेकिन शक्ति भी पदार्थगत नहीं है, आत्मगत है, इसलिए उसका पहला अनुभव स्वयं में प्रवेश पर ही होता है | - आचार्य रजनीश

⇨ भगवान् निराकार है और साकार भी | फिर वे इन दोनों अवस्थाओं से परे जो हैं, वे भी हैं | केवल वे ही स्वयं जानते हैं कि वे क्या हैं ? - रामकृष्ण परमहंस 

⇨ भगवान् को समर्पण करने का अर्थ है अपनी तंग सीमाओं का त्याग करके अपने आपको उनके द्वारा आक्रांत होने देना और उनकी लीला का केंद्र बनने देना - माता पाण्डिचेरी 

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Gaurav Hindustani

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