Saturday, May 25, 2019

संकल्प ही है जीवन की उत्कृष्टता का मन्त्र

यदि वास्तविकता में हम अपने जीवन में कुछ करना चाहते हैं, अपने सुनहरे सपने साकार करने चाहते हैं, आसमान की बुलंदियों को छूना चाहते हैं तो हमे अपने अन्दर सोये हुए ज्ञान को जाग्रत करना होगा | अपनी आत्मा को झकझोरना होगा तभी वह एक चरित्र का निर्माण करने में सहायक होगा | 

अन्यमनस्कता, उदासीनता और मुर्दादिली को छोड़कर ऊँचे उठने की कल्पना मनःक्षेत्र को सतेज करती है | इससे साहस, शौर्य, कर्मठता, उत्पादन, निपुणता आदि गुणों का आविर्भाव होता है | इन गुणों में शक्तियों का वह स्रोत छिपा हुआ है, जिससे संतोष, सुख और आनन्द का प्रतिक्षण रसास्वादन किया जासकता है | निकृष्टता मनुष्यों में दुर्गुण पैदा करती, जिससे चारों ओर से कष्ट और क्लेश के परिणाम ही दिखाई दे सकते हैं | संकल्प को इसीलिए जीवन की उत्कृष्टता का मन्त्र समझना चाहिए | उसका प्रयोग जीवन के गुणों के विकास के लिए होना चाहिए | 

अपने को असमर्थ, अशक्त एवं असहाय मत समझिये | "साधनों के अभाव में किस प्रकार आगे बढ़ सकेंगे" ऐसे कमजोर विचारों का परित्याग कर दीजिये | स्मरण रखिये शक्ति का स्रोत साधनों में नहीं, संकल्प में है | यदि उन्नति करने की, आगे बढने की इच्छाएँ तीव्र हो रही होंगी तो आपको जिन साधनों का आज अभाव दिखलाई पड़ता है, कल वे निश्चय ही दूर हुए दिखाई देंगे | दृढ़ संकल्प से स्वल्प साधनों में भी मनुष्य अधिकतम विकास कर सकता है और मस्ती का जीवन बिता सकता है | दीपक कब कहता है कि वह दस किलो तेल होता तो सबको प्रकाश देता | अपने सीमित साधनों से ही प्रकाश देने लगता है | 

उन्नति की आकांक्षा रखना मनुष्य का स्वाभाविक गुण है | उसे आगे बढ़ना भी चाहिए, पर यह तभी संभव है, जब मनुष्य का संकल्प बल जाग्रत हो | संकल्प के द्वारा प्रत्येक मनुष्य सफलता प्राप्त कर सकता है | एक व्यक्ति था जो अपनी पत्नि द्वारा 'महामूर्ख' कहा गया, बरती तरह तिरस्कृत और लांछित हुआ |  बात उसके गुप्त मन में लग गई | उसे बहुत बुरा लगा | उसने पत्नि को छोड़ा और बड़ी आयु में विद्या अध्ययन में लग गया | दीर्घकाल के अभ्यास और अटल संकल्प के बल से वह संस्कृत का महाकवि कालिदास बना |  समग्र भारत उसकी प्रतिभा और विद्या से चमत्कृत हो उठा | उसके गुप्त मन में काव्य शक्ति का वृहद भण्डार छिपा हुआ था |

एक डाकू था, जिसकी जीविका का उपार्जन मुसाफिरों को लूटने और हत्याएँ करने से चलता था | एक दिन एक मुनि उसकी पकड में आ गये | उसने उन्हें भी मारना चाहा, पर उन्होंने विनीत भाव से उससे कहा, "जिन व्यक्तियों को पालने के इए तुम इतने व्यक्तियों की हत्या का पाप अपने ऊपर ले रहे हो, क्या वे तुम्हारे इस पाप में हिस्सेदार बनेंगे ? जाओ और अपने परिवार वालों से पूछो |"  डाकू चला गया | उसने यह बात पूछी, लेकिन उनका उत्तर सुनते ही उसका चेहरा उतर गया | उनका उत्तर था - "हम तुम्हारे आश्रित हैं | पाप-पुण्य से हमे क्या प्रयोजन ?"  उसे ज्ञान हुआ | वह बदलकर महर्षि वाल्मीकि बन गया | उसकी गुप्त शक्तियां यकायक खुल गई | उन्होंने संसार को अपनी बुद्धि से चमत्कृत कर दिया | इसी प्रकार न जाने कितने महान पुरुष हुए हैं, जिन्हें किसी मानसिक आघात लगने से अपने गुप्त मन में सोई पड़ी गुप्त शक्तियों का ज्ञान हुआ, उनका जीवन पृष्ट बदला और वे अपने गुणों से संसार को चमत्कृत-विस्मित का गये | 

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Gaurav Hindustani

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