Friday, May 24, 2019

सफलता की जननी "संकल्प शक्ति"

"यह मेरा संकल्प है |" इसका अर्थ है कि अब मैं इस कार्य में प्राण, मन और समग्र शक्ति के साथ संलग्न हो रहा हूँ | इस प्रकार की विचारणा-दृढ़ता ही सफलता की जननी है | संकल्प तप का, क्रियाशक्ति का विधायक है | इसी में अनेक सिद्धियाँ और वरदान समाहित हैं | 

जिन विचारों का मनोभूमि में स्थायी प्रभाव पड़ता है और जिनसे अंतःकरण में अमिट स्वाभाव के एक अंग बन जाते हैं | ऐसे विचारों का अपना एक विशेष महत्व होता है | इन विचारों को क्रमबद्ध रीति से साने की क्रियान जिन्हें ज्ञात होती है, वे अपना भाग्य, दृष्टिकोण और वातावरण परिवर्तित कर सकते हैं और इस परिवर्तन के फलस्वरूप जीवन में कोई विशेष दृश्य या स्थिति उत्पन्न कर सकते हैं | 

आवश्यकता को आविष्कार की जननी कहा जाता है | जब किसी की तीव्र इच्छा होती है, तो उसे पूर्ण करने के लिए साधनों के लिए तलाश आरम्भ होती है, अतः कोई न कोई  उपाय भी निकल ही आता है | वह इच्छा यदि प्रेरक है, उसे पूरा करने की भूख यदि भीतर से उठी है और उसके पीछे प्राण और जीवन लगा हुआ है कि "मैं इस वस्तु को प्राप्त करके रहूँगा, चाहे कितनी ही बाधाएँ क्यों न आयें प्रयत्न निरंतर जारी रखूँगा, चाहे कितने ही निराश करने वाले अवसर क्यों न आएँ" इस प्रकार के संकल्प की यदि मन में गहरी और सुदृढ स्थापना हो जाये तो लक्ष्य तक पहुँचना बहुत सरल हो जाता है | दूसरे के लिए कठिन जान पड़ने वाला कार्य भी संकल्पवान के लिए सामान्य क्रिया से अधिक नहीं रह जाता | 

बराबर आगे बढ़ते रहने के लिए बराबर नई शक्ति प्राप्त करते रहना भी आवश्यक है | उन्नति का क्रम टूटना नहीं चाहिए | आगे बढने से रुकना या हिचकिचाना नहीं चाहिए, पर यह तभी सम्भव है, जब हमारा संकल्प, हमारा उद्देश्य अटूट साहस, श्रद्धा एवं शक्ति से ओत-प्रोत हो | आधे मन से, उदासीन होकर कार्य करने वाला फूहड़ कहा जाता है | उसे कोई विशेष सफलता मिल ही नहीं पाती | 

"अगर मुझे अमुक सुविधाएँ मिलतीं तो मैं ऐसा करता |" इस प्रकार कोरी कल्पनाएँ गढ़ने वाले आत्मप्रवंचन किया करते हैं | भाग्य दूसरों के सहारे विकसित नहीं होता | आपका भार ढ़ोंने के लिए संसार में कोई दूसरा तैयार न होगा | हम यह यात्रा अपने पैरों से ही पूरी कर सकते हैं | दूसरे का अवलम्बन लेंगे तो हमारा जीवन कठिन हो जायेगा | हमारे भीतर जो एक महान चेतना कार्य कर रही है, उसकी शक्ति अनंत है | उसका आश्रय ग्रहण करें  तो प्रत्यक्ष आत्मविश्वास जाग जायेगा | तब तुम दूसरों के भरोसे भी नहीं रहोगे | संकल्प का दूसरा रूप है - आत्मविश्वास |  

वह जाग्रत हो जाये तो अपना विकास तेजी से अपने आप पूरा कर सकेंगे | आज हम जैसे कुछ हैं, अपने जीवन को जिस स्थिति में रखे हुए हैं, अपनी निजी  विचारों के परिणाम है | जैसे विचार होंगे, भविष्य का निर्माण भी उसी तरह ही होगा | 

"हम अपनी संकल्प शक्ति को कैसे बढायें और कैसे स्वयं में संकल्प शक्ति का निर्माण करें, इसके लिए हमें अपनी संस्कृति की ओर लौटना होगा | प्राचीन काल में हमारे ऋषि मुनि तप किया करते थे, व्रत किया करते थे | यहाँ व्रत का तात्पर्य संकल्प से है न कि आज के व्रत से जो सिर्फ़ भूखे रहने के नाम पर भी आडम्बर करते हैं | हमें उन ऋषियों से, उन विद्वानों से उस संकल्प शक्ति को सीखना होगा उन्हें पढ़ना होगा | तभी हमारे अन्दर की सुसुप्त चेतना को जगाया जा सकता है | तो आइये संकल्प करें अपने लक्ष्य निर्धारण करने का | अपने जीवन के ध्येय को समझने का और साकार करें अपने सुनहरे सपने | "

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Gaurav Hindustani

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