Friday, May 31, 2019

सदगुण बढ़ाएँ-शिष्टाचार अपनाएँ

Increase Virtue, Adopt manners
मनुष्य के पास सबसे बड़ी पूँजी सदगुणों की है | जिसके पास जितने सदगुण हैं, वह उतना ही बड़ा अमीर है | धन के बदले बाजार में हर चीज खरीदी जा सकती है | इसी प्रकार सदगुणों की पूँजी से किसी भी दिशा में अभीष्ट प्रगति की जा सकती है | जिसके भीतर सदगुणों की पूँजी भरी पड़ी है, आत्मबल और आत्मविश्वास उसे दैवी सहायता की तरह सदा प्रगति का मार्ग दिखाते हैं | अपने मधुर स्वभाव के कारण वह जहाँ भी जाता है, वहीँ अपना स्थान बना लेता है | अपनी विशेषताओं से वह सभी को प्रभावित करता है और सभी की सहानुभूति पाता है | दूसरों को प्रभावित करने और अपनी सफलता का प्रधान कारण तो अपने सदगुण ही होते हैं | जिसके पास यह विशेषता होगी, उसके लिए पराये अपने बन जायेंगे और शत्रुओं को मित्र बनने में देर न लगेगी | जीवन का आधार स्तम्भ सदगुण हैं | अपने गुण-कर्म-स्वभाव को श्रेष्ट बना लेना, अपनी आदतों को श्रेष्ट सज्जनों की तरह ढाल देना, वस्तुतः ऐसी बड़ी सफलता है, जिसकी तुलना किसी भी अन्य सांसारिक लाभ से नहीं की जा सकती | सदगुणों के विकास का उचित मार्ग यह है कि उन्ही के सम्बन्ध में विशेष रूप से विचार किया करें, वैसा ही पढ़ें, वैसा ही सुनें, वैसा ही कहें, वैसा ही सोचें जो सदगुणों को बढ़ाने में, सत्प्रवृत्तियों को ऊँचा उठाने में सहायक हो | सदगुणों को अपनाने से अपने उत्थान और आनन्द का मार्ग कितना प्रशस्त हो सकता है, इसका चिंतन और मनन करना चाहिए | 

अपने अन्दर सदगुणों के जितने बीजांकुर दिखाई पड़ें, जो अच्छाईयां और सत्प्रवृत्तियां दिखाई पड़े, उन्हें खोजते रहना चाहिए | जो मिलें उन पर प्रसन्न होना चाहिए और उन्हें सींचने-बढ़ाने में लग जाना चाहिए | घास-पात के बीच यदि कोई अच्छा पेड़-पौधा उगा होता है, तो उसे देखकर चतुर किसान प्रसन्न होता है और उसकी सुरक्षा तथा अभिवृद्धि की व्यवस्था जुटाता है, ताकि उस छोटे पौधे के विशाल वृक्ष बन जाने से उपलब्ध होने वाले लाभों से वह लाभान्वित हो सके | हमे भी अपने सदगुणों को इसी प्रकार खोजना चाहिए | जो अंकुर उगा हुआ है, यदि उसकी आवश्यक देखभाल की जाती रहे तो वह जरुर बढ़ेगा और एक दिन पुष्प-पल्लवों से हर-भरा होकर चित्त में आनन्द उत्पन्न करेगा | हम सज्जन बनेंगे, श्रेष्टताएँ बढ़ाएंगे, सदगुणों का विकास करेंगे, यही अपनी आकांक्षाएं रहनी चाहिए | 

एक राजा को एक दिन स्वप्न में एक साधू ने बताया कि कल रात को एक विषैले सर्प के काटने से तेरी मृत्यु हो जाएगी | वह सर्प तुम्हारा पूर्व जन्म का शत्रु है और अमुक पेड़ की जड़ में रहता है | प्रातः काल राजा सोकर उठा | विचार करने लगा कि आत्मरक्षा के लिए क्या उपाय करना चाहिए ? राजा को विश्वास था किस उसका सपना सच्चा है | उसने सर्प के साथ मधुर व्यवहार का निश्चय किया | संध्या होते ही पेड़ की जड़ से लेकर अपनी शैय्या तक फूलों का बिछौना बिछवा दिया | सुगन्धित जलों का छिड्काव करवा दिया, मीठे दूध के कटोरे जगह-जगह दिये और सेवकों से कह दिया कि सर्प आये तो उसे कोई किसी प्रकार का कष्ट न दे | 

रात्रि के समय सर्प जैसे-जैसे राजा के महल की तरफ बढ़ता गया, उसका क्रोध कम होता गया | अंत में जब राजा के पास पहुँचा तो उसके सद्व्यवहार से प्रसन्न होकर मित्रता के उपहारस्वरुप अपनी बहुमूल्य मणि देकर वापस चला गया | भलमनसाहत और सद्व्यवहार ऐसे प्रबल अस्त्र हैं , जिनसे बुरे से बुरे स्वभाव के दुष्ट मनुष्यों को भी परास्त होना पड़ता है | 

सुकरात बहुत ही कुरूप थे, फिर भी वे सदा दर्पण पास रखते थे और बार-बार मुँह देखते थे | एक मित्र ने कारण पूछा तो उन्होंने कहा, "सोचता हूँ, इस कुरूपता का प्रतिकार मुझे अधिक अच्छे कार्यों से सुन्दरता बढ़ाकर करना चाहिए | इसी बात को याद रखने में दर्पण से सहायता मिलती है |" दूसरी बात सुकरात ने कही, "जो सुन्दर हैं, उन्हें भी बार-बार दर्पण देखना चाहिए और सीखना चाहिए कि ईश्वर प्रदत्त सौन्दर्य पर कहीं दुष्प्रवृत्तियों के कारण दाग-धब्बा न लग जाये |" इनका मत था - "मनुष्य में चन्दन जैसे गुण चाहिए, सुडौल हो या बेडौल, बिखेरें सुगन्ध ही|"

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Gaurav Hindustani

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2 comments:

  1. Replies
    1. बहुत बहुत आभार प्रतिक्रिया के लिये ।
      आशा करता हूँ आगे भी जुड़े रहेंगे हमसे और अपनी बहुमूल्य प्रतिक्रिया देते रहेंगे ।

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