Thursday, May 30, 2019

पढ़ें और उसे जीवन में उतारें

Study and use in your life

स्वाध्याय एवं चिंतन-मनन की महत्ता का प्रतिपादन शास्त्रों में विस्तारपूर्वक किया गया है | मनुस्मृति में उल्लेख है - "स्वाध्याये नित्ययुक्त: स्यात् |" अर्थात स्वाध्याय में नित्य तत्पर रहना चाहिए, क्योंकि इससे सदविवेक-सदबुद्धि का विकास होता है और उससे समस्त समस्याओ का समाधान मिलता है | प्राकृत-उत्तराध्ययन भी इसका समर्थन करते हुए कहता है - "सज्झाएवा निउत्तेण, सव्वदुक्ख विमोक्खने |" अर्थात स्वाध्याय करते रहने से समस्त दुखों से मुक्ति मिलती है | इसी ग्रन्थ के अगले सूत्र में इससे मिलने वाले सत्परिणाम का उल्लेख है - "सज्झायं च ताओकुज्जा सव्वभावविभावणम |" अर्थात स्वाध्याय  सभी प्रकार के भावों को प्रकाशित करने वाला है | 

स्वाध्याय की इस महत्ता को जानते हुए प्राय: लोग अच्छी पुस्तकें (जैसे : श्रीमद्भागवत गीता, श्रीरामचरितमानस, वेद, पुराण, उपनिषद, रोचक और प्रेरक कहानियाँ आदि ) पढ़ते भी हैं, परन्तु जो पढ़ा गया है, उस पर चिंतन (Thinking), मनन (Contemplation) और वार्तालाप (Discussion) नहीं करते | 

यही कारण है कि उस अध्ययन का प्रभाव जीवन में स्थायी नही हो पाता | यदि पुस्तकों - शास्त्रों  के सार जीवन में उतारने की प्रक्रिया लोग सीख जाएँ, तो सामान्य-सी परिस्तिथियों ने ही हर व्यक्ति उत्कृष्टता के चरम बिंदु तक पहुँच सकता है | अच्छी पुस्तकें, महापुरुषों की जीवन-गाथाएं (जैसे : श्रीराम, श्रीकृष्ण, राष्ट्रीय पिता महात्मा गाँधी, महाराणा प्रताप, सुभाष चन्द्र बोस आदि की जीवन कहानियाँ) गोघृत एवं दुग्ध के समान पौष्टिक आहार हैं, जो मन-बुद्धि, आचार-विचार, तर्क व विवेक को परिपुष्ट करके आत्मोत्थान का उज्ज्वल पथ प्रशस्त करती हैं | 

बात उन दिनों की है, जब गाँधीजी  (  राष्ट्रीय पिता महात्मा गाँधी जी ) दक्षिण अफ्रीका (South Africa) में थे | उन्होंने बहुचर्चित नेता ग्लैडस्टन की जीवनी पढ़ी थी | उसमे एक प्रसंग ऐसा था, जिसने गाँधी जी के जीवन की धारा को उलट कर रख दिया - "एक दिन एक आम सभा हो रही थी उसमे ग्लैडस्टन के साथ उनकी धर्मपत्नी भी थीं ग्लैडस्टन को चाय पीनी की आदत थी | चाय बनाने का कार्य उनकी धर्मपत्नी ही करती थीं | आम सभा के बीच ग्लैडस्टन ने चाय पीने की इच्छा व्यक्त की तो श्रीमती ग्लैडस्टन ने बिना किसी झिझक, लज्जा या संकोच के अपने हाथ से वहीँ चाय बनाई, पति को पिलायी और कप-प्लेट स्वयं अपने हाथ से साफ़ किये | ऐसा उन्होंने कई स्थानों में किया | "

इस धटना को पढ़कर गाँधी (Mahatma Gandhi Ji ) जी के जीवन में जो प्रतिक्रिया हुई, उसका उल्लेख उन्होंने स्वयं इन शब्दों में किया है - "पत्नि के प्रति वफादारी मेरे सत्य के व्रत का अंग थी, पर अपनी स्त्री के साथ भी ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए, यह बात दक्षिण अफ्रीका में ही स्पष्ट रूप से समझ में आई |"

गाँधीजी ने उक्त प्रसंग जब रामचंद्र भाई को बड़े-कौतूहल के साथ सुनाया, तो उन्होंने कहा, "बापू इसमें आश्चर्य की क्या बात है ? अब आप बताइए अपनी बहिनें-बेटियाँ और छोटे-छोटे बच्चे क्या ऐसे कार्य भी नहीं कर सकते ? बड़ों की आज्ञापालन में तो उन्हें प्रसन्नता ही होती है | पत्नि के इस व्यवहार को असामान्य मानने का एक ही कारण हो सकता है, पत्नि से कोई आकांक्षा | साधारण लोग अपनी धर्मपत्नी को कामवासना की द्रष्टि से, भोग-विलास की द्रष्टि से देखते हैं | उसमे नारी के प्रति हीनता का भाव आता है | यही भाव हम उसके साथ प्रत्येक कार्य में आरोपित करते हैं | पत्नि उसे ही बुरा मानती है | यदि उसे हीनता या कामुकता की द्रष्टि से न देखा जाए, तो सचमुच प्रत्येक स्त्री ग्लैडस्टन की धर्मपत्नी की तरह ही बहन-बेटियों की सी सेवा बिना लज्जा या संकोच के कर सकती हैं |"

गाँधी जी को यह बात बड़ी महत्वपूर्ण लगी | ग्लैडस्टन के जीवन-चरित्र को पढ़ने से जिस मर्म को वह नहीं भेद पाए थे, वह वार्तालाप से खुल गया | तब तक कस्तूरबा और उनमे प्राय: अनबन हो जाया करती थी | उस दिन से बापू ने ब्रह्मचर्य का व्रत लिया  और इतिहास जानता है कि उसके बाद कस्तूरबा गाँधी ने गाँधी जी को सच्चे मित्र की भांति खुलकर कंधे से कंधा मिलाकर सहयोग प्रदान किया | उन्होंने उनके साथ जेल जाने तक में भी झिझक या संकोच नहीं किया |  

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Gaurav Hindustani

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