Friday, May 31, 2019

सदगुण बढ़ाएँ-शिष्टाचार अपनाएँ

Increase Virtue, Adopt manners
मनुष्य के पास सबसे बड़ी पूँजी सदगुणों की है | जिसके पास जितने सदगुण हैं, वह उतना ही बड़ा अमीर है | धन के बदले बाजार में हर चीज खरीदी जा सकती है | इसी प्रकार सदगुणों की पूँजी से किसी भी दिशा में अभीष्ट प्रगति की जा सकती है | जिसके भीतर सदगुणों की पूँजी भरी पड़ी है, आत्मबल और आत्मविश्वास उसे दैवी सहायता की तरह सदा प्रगति का मार्ग दिखाते हैं | अपने मधुर स्वभाव के कारण वह जहाँ भी जाता है, वहीँ अपना स्थान बना लेता है | अपनी विशेषताओं से वह सभी को प्रभावित करता है और सभी की सहानुभूति पाता है | दूसरों को प्रभावित करने और अपनी सफलता का प्रधान कारण तो अपने सदगुण ही होते हैं | जिसके पास यह विशेषता होगी, उसके लिए पराये अपने बन जायेंगे और शत्रुओं को मित्र बनने में देर न लगेगी | जीवन का आधार स्तम्भ सदगुण हैं | अपने गुण-कर्म-स्वभाव को श्रेष्ट बना लेना, अपनी आदतों को श्रेष्ट सज्जनों की तरह ढाल देना, वस्तुतः ऐसी बड़ी सफलता है, जिसकी तुलना किसी भी अन्य सांसारिक लाभ से नहीं की जा सकती | सदगुणों के विकास का उचित मार्ग यह है कि उन्ही के सम्बन्ध में विशेष रूप से विचार किया करें, वैसा ही पढ़ें, वैसा ही सुनें, वैसा ही कहें, वैसा ही सोचें जो सदगुणों को बढ़ाने में, सत्प्रवृत्तियों को ऊँचा उठाने में सहायक हो | सदगुणों को अपनाने से अपने उत्थान और आनन्द का मार्ग कितना प्रशस्त हो सकता है, इसका चिंतन और मनन करना चाहिए | 

अपने अन्दर सदगुणों के जितने बीजांकुर दिखाई पड़ें, जो अच्छाईयां और सत्प्रवृत्तियां दिखाई पड़े, उन्हें खोजते रहना चाहिए | जो मिलें उन पर प्रसन्न होना चाहिए और उन्हें सींचने-बढ़ाने में लग जाना चाहिए | घास-पात के बीच यदि कोई अच्छा पेड़-पौधा उगा होता है, तो उसे देखकर चतुर किसान प्रसन्न होता है और उसकी सुरक्षा तथा अभिवृद्धि की व्यवस्था जुटाता है, ताकि उस छोटे पौधे के विशाल वृक्ष बन जाने से उपलब्ध होने वाले लाभों से वह लाभान्वित हो सके | हमे भी अपने सदगुणों को इसी प्रकार खोजना चाहिए | जो अंकुर उगा हुआ है, यदि उसकी आवश्यक देखभाल की जाती रहे तो वह जरुर बढ़ेगा और एक दिन पुष्प-पल्लवों से हर-भरा होकर चित्त में आनन्द उत्पन्न करेगा | हम सज्जन बनेंगे, श्रेष्टताएँ बढ़ाएंगे, सदगुणों का विकास करेंगे, यही अपनी आकांक्षाएं रहनी चाहिए | 

एक राजा को एक दिन स्वप्न में एक साधू ने बताया कि कल रात को एक विषैले सर्प के काटने से तेरी मृत्यु हो जाएगी | वह सर्प तुम्हारा पूर्व जन्म का शत्रु है और अमुक पेड़ की जड़ में रहता है | प्रातः काल राजा सोकर उठा | विचार करने लगा कि आत्मरक्षा के लिए क्या उपाय करना चाहिए ? राजा को विश्वास था किस उसका सपना सच्चा है | उसने सर्प के साथ मधुर व्यवहार का निश्चय किया | संध्या होते ही पेड़ की जड़ से लेकर अपनी शैय्या तक फूलों का बिछौना बिछवा दिया | सुगन्धित जलों का छिड्काव करवा दिया, मीठे दूध के कटोरे जगह-जगह दिये और सेवकों से कह दिया कि सर्प आये तो उसे कोई किसी प्रकार का कष्ट न दे | 

रात्रि के समय सर्प जैसे-जैसे राजा के महल की तरफ बढ़ता गया, उसका क्रोध कम होता गया | अंत में जब राजा के पास पहुँचा तो उसके सद्व्यवहार से प्रसन्न होकर मित्रता के उपहारस्वरुप अपनी बहुमूल्य मणि देकर वापस चला गया | भलमनसाहत और सद्व्यवहार ऐसे प्रबल अस्त्र हैं , जिनसे बुरे से बुरे स्वभाव के दुष्ट मनुष्यों को भी परास्त होना पड़ता है | 

सुकरात बहुत ही कुरूप थे, फिर भी वे सदा दर्पण पास रखते थे और बार-बार मुँह देखते थे | एक मित्र ने कारण पूछा तो उन्होंने कहा, "सोचता हूँ, इस कुरूपता का प्रतिकार मुझे अधिक अच्छे कार्यों से सुन्दरता बढ़ाकर करना चाहिए | इसी बात को याद रखने में दर्पण से सहायता मिलती है |" दूसरी बात सुकरात ने कही, "जो सुन्दर हैं, उन्हें भी बार-बार दर्पण देखना चाहिए और सीखना चाहिए कि ईश्वर प्रदत्त सौन्दर्य पर कहीं दुष्प्रवृत्तियों के कारण दाग-धब्बा न लग जाये |" इनका मत था - "मनुष्य में चन्दन जैसे गुण चाहिए, सुडौल हो या बेडौल, बिखेरें सुगन्ध ही|"

सदगुण बढ़ाएँ-शिष्टाचार अपनाएँ
सदगुण बढ़ाएँ-शिष्टाचार अपनाएँ

"नारी"

मै नारी का सम्मान करती हूँ अपने शब्दों से और सोच से नारी को परिभाषित करने की कोशिश की है, नारी तो प्रेम और समर्पण के लिये ही जानी जाती है, लेकिन कुछ अपवाद छोड़कर, विडंबना ही है कि, कई मायनो में आज भी वह धोखे, छलावा और अपमान की शिकार होती हे ,नि:संदेह नारी स्वयं ये बदलाव ला सकती है,  लेकिन समाज, लोकलाज ,और परिवार नाम की बेड़ियां उसे बाँध देती हैं कटु सत्य है किसी और की क्या बात करें.. हममे से ही कुछ नारियाँ इस एक कप चाय के फैसलों पर आपना जीवन जला चुकी है पर चुप्पी है कि टूटती नहीं... और... जिसने चुप्पी तोड़ना चाहा.. समाज उसे तोड़ देता है.. निगाहों से या तानों और व्यवहार से.. हमने जो समझौते किये हैं अपनी बेटियों को नहीं करने देंगे... जिन्हें हम पढ़ा लिखा समाज समझते हैं वह लोग वास्तव में क्या स्त्री को सामान्य दर्जा देते हैं? हमारे समाज के सामने बहुत बड़ा सवाल है जिसका जवाब देने से ये शिक्षित लोग ही घबराते हैं.. नारी के घर की मालकिन, ग्रहमंत्री, होममिनिस्टर और न जाने किन किन नामों से नवाज़ा जाता है..पर क्या हकीकत में ऐसा है? दीपक तले अँधेरा जैसा किस्सा है.. जो पूरे घर की ताकत कहलाती है कही न कही वही अबला बनाई जाती है | उड़ान भरने की सलाह तो दी जाती है साथ ही पंख काट दिये जाते हैं.. बस एक भ्रम दे दिया जाता है नारी को कि ये रौशनी तुम्हारी सिर्फ तुम्हारी है.. और रितीरिवाज़ो की बेडी पहनाकर संस्कारों की कैद में दफ़न कर दी जाती है |
   "ऐसे आसमान में उड़ाने से बेहतर ज़मी है  |"
  ऐसे उजालों से बेहतर एक चिराग़ की रौशनी है | स्त्रियों को बहुत सी उपाधी दे दी जाती है, किंतु धरातल पर ये उपाधी बिल्कुल भी  सटीक नहीं बैठता,, कहीं कहीं तो आजीविका कमाते हुए भी उसे अपनी ही आमदनी खर्च करने की आजादी नहीं होती,, परम्पराओं के नाम पर बहुत सी बेड़ियां पहना दी जाती है,,सच कहूं तो चाहे शिक्षित समाज हो या अशिक्षित सभी जगह स्त्रियों की स्थिति दयनीय है । बेहद बेबाक़ी से समकालीन परिदृश्य में नारी की वास्तविक स्थिति का वर्णन किया है हमने । कथनी और करनी के विरोधाभास को बेहद संज़ीदगी से रेखांकित करने का प्रयास किया है, वस्तुतः,वर्तमान में नारी के समक्ष अनेक चुनौतियां हैं...सदियों की घिसी-पिटी मान्यताओं और वर्जनाओं को तोड़ने की...जड़ता को हिलाने की..और बुलंदियों को छूने की ! देखते हैं...ज़मीनी हक़ीक़त कब बदलती है?  रचना का मूल अर्थ  रचना को लिखने का उद्देश्य यही है कि ज़मीनी हकीकत को बदलने के लिए शुरूआत और सभी का साथ.. कुछ प्रतिशत योगदान हैं हमारा.. देश का नागरिक और नारी का फर्ज़ अदा करने की छोटी सी कोशिश ..

नारी - प्रिया बतरा
नारी - प्रिया बतरा

Priya Batra 
(Nagpur)

Thursday, May 30, 2019

पढ़ें और उसे जीवन में उतारें

Study and use in your life

स्वाध्याय एवं चिंतन-मनन की महत्ता का प्रतिपादन शास्त्रों में विस्तारपूर्वक किया गया है | मनुस्मृति में उल्लेख है - "स्वाध्याये नित्ययुक्त: स्यात् |" अर्थात स्वाध्याय में नित्य तत्पर रहना चाहिए, क्योंकि इससे सदविवेक-सदबुद्धि का विकास होता है और उससे समस्त समस्याओ का समाधान मिलता है | प्राकृत-उत्तराध्ययन भी इसका समर्थन करते हुए कहता है - "सज्झाएवा निउत्तेण, सव्वदुक्ख विमोक्खने |" अर्थात स्वाध्याय करते रहने से समस्त दुखों से मुक्ति मिलती है | इसी ग्रन्थ के अगले सूत्र में इससे मिलने वाले सत्परिणाम का उल्लेख है - "सज्झायं च ताओकुज्जा सव्वभावविभावणम |" अर्थात स्वाध्याय  सभी प्रकार के भावों को प्रकाशित करने वाला है | 

स्वाध्याय की इस महत्ता को जानते हुए प्राय: लोग अच्छी पुस्तकें (जैसे : श्रीमद्भागवत गीता, श्रीरामचरितमानस, वेद, पुराण, उपनिषद, रोचक और प्रेरक कहानियाँ आदि ) पढ़ते भी हैं, परन्तु जो पढ़ा गया है, उस पर चिंतन (Thinking), मनन (Contemplation) और वार्तालाप (Discussion) नहीं करते | 

यही कारण है कि उस अध्ययन का प्रभाव जीवन में स्थायी नही हो पाता | यदि पुस्तकों - शास्त्रों  के सार जीवन में उतारने की प्रक्रिया लोग सीख जाएँ, तो सामान्य-सी परिस्तिथियों ने ही हर व्यक्ति उत्कृष्टता के चरम बिंदु तक पहुँच सकता है | अच्छी पुस्तकें, महापुरुषों की जीवन-गाथाएं (जैसे : श्रीराम, श्रीकृष्ण, राष्ट्रीय पिता महात्मा गाँधी, महाराणा प्रताप, सुभाष चन्द्र बोस आदि की जीवन कहानियाँ) गोघृत एवं दुग्ध के समान पौष्टिक आहार हैं, जो मन-बुद्धि, आचार-विचार, तर्क व विवेक को परिपुष्ट करके आत्मोत्थान का उज्ज्वल पथ प्रशस्त करती हैं | 

बात उन दिनों की है, जब गाँधीजी  (  राष्ट्रीय पिता महात्मा गाँधी जी ) दक्षिण अफ्रीका (South Africa) में थे | उन्होंने बहुचर्चित नेता ग्लैडस्टन की जीवनी पढ़ी थी | उसमे एक प्रसंग ऐसा था, जिसने गाँधी जी के जीवन की धारा को उलट कर रख दिया - "एक दिन एक आम सभा हो रही थी उसमे ग्लैडस्टन के साथ उनकी धर्मपत्नी भी थीं ग्लैडस्टन को चाय पीनी की आदत थी | चाय बनाने का कार्य उनकी धर्मपत्नी ही करती थीं | आम सभा के बीच ग्लैडस्टन ने चाय पीने की इच्छा व्यक्त की तो श्रीमती ग्लैडस्टन ने बिना किसी झिझक, लज्जा या संकोच के अपने हाथ से वहीँ चाय बनाई, पति को पिलायी और कप-प्लेट स्वयं अपने हाथ से साफ़ किये | ऐसा उन्होंने कई स्थानों में किया | "

इस धटना को पढ़कर गाँधी (Mahatma Gandhi Ji ) जी के जीवन में जो प्रतिक्रिया हुई, उसका उल्लेख उन्होंने स्वयं इन शब्दों में किया है - "पत्नि के प्रति वफादारी मेरे सत्य के व्रत का अंग थी, पर अपनी स्त्री के साथ भी ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए, यह बात दक्षिण अफ्रीका में ही स्पष्ट रूप से समझ में आई |"

गाँधीजी ने उक्त प्रसंग जब रामचंद्र भाई को बड़े-कौतूहल के साथ सुनाया, तो उन्होंने कहा, "बापू इसमें आश्चर्य की क्या बात है ? अब आप बताइए अपनी बहिनें-बेटियाँ और छोटे-छोटे बच्चे क्या ऐसे कार्य भी नहीं कर सकते ? बड़ों की आज्ञापालन में तो उन्हें प्रसन्नता ही होती है | पत्नि के इस व्यवहार को असामान्य मानने का एक ही कारण हो सकता है, पत्नि से कोई आकांक्षा | साधारण लोग अपनी धर्मपत्नी को कामवासना की द्रष्टि से, भोग-विलास की द्रष्टि से देखते हैं | उसमे नारी के प्रति हीनता का भाव आता है | यही भाव हम उसके साथ प्रत्येक कार्य में आरोपित करते हैं | पत्नि उसे ही बुरा मानती है | यदि उसे हीनता या कामुकता की द्रष्टि से न देखा जाए, तो सचमुच प्रत्येक स्त्री ग्लैडस्टन की धर्मपत्नी की तरह ही बहन-बेटियों की सी सेवा बिना लज्जा या संकोच के कर सकती हैं |"

गाँधी जी को यह बात बड़ी महत्वपूर्ण लगी | ग्लैडस्टन के जीवन-चरित्र को पढ़ने से जिस मर्म को वह नहीं भेद पाए थे, वह वार्तालाप से खुल गया | तब तक कस्तूरबा और उनमे प्राय: अनबन हो जाया करती थी | उस दिन से बापू ने ब्रह्मचर्य का व्रत लिया  और इतिहास जानता है कि उसके बाद कस्तूरबा गाँधी ने गाँधी जी को सच्चे मित्र की भांति खुलकर कंधे से कंधा मिलाकर सहयोग प्रदान किया | उन्होंने उनके साथ जेल जाने तक में भी झिझक या संकोच नहीं किया |  

पढ़ें और उसे जीवन में उतारें
पढ़ें और उसे जीवन में उतारें

Wednesday, May 29, 2019

अपनी कमजोरियों से लड़े - मजबूत बनें

Fight with Your Weaknesses - Be Strong
संसार में कोई किसी को उतना परेशान नहीं करता, जितना कि मनुष्य के अपने दुर्गुण और दुर्भावनाएँ | दुर्गुण रूपी शत्रु हर समय मनुष्य के पीछे लगे रहते हैं, वे किसी समय उसे चैन नहीं लेते देते |

कहावत है कि "अपनी अकल और दूसरों की सम्पत्ति, चतुर को चौगुनी और मूरख को सौगुनी दिखाई पड़ती है |" संसार में व्याप्त इस भ्रम को महामाया का मोहक जाल ही कहना चाहिए कि हर व्यक्ति अपने को पूर्ण निर्दोष और पूर्ण बुद्धिमान मानता है | न तो उसे अपनी त्रुटियाँ सूझ पड़ती हैं और न अपनी समझ में दोष दिखाई पड़ता है |  इस एक ही दुर्बलता ने मानवजाति की प्रगति में इतनी बाधा पहुँचाई है,  जितनी संसार की समस्त अडचनों ने मिलकर भी न पहुँचाई होगी | 

सृष्टि के सब प्राणियों से अधिक बुद्धिमान माना जाने वाला मनुष्य जब यह सोचता है कि "दोष तो दूसरों में ही हैं, उन्हीं की निंदा करनी है, उन्हें ही सुधारना चाहिए | हम स्वयं तो पूर्ण निर्दोष हैं, हमें सुधरने की कोई जरुरत नहीं |" इस दृष्टिकोण के कारण अपनी गलतियों का सुधार कर सकना तो दूर कोई उस ओर इशारा भी करता है, तो हमें अपना अपमान दिखाई पड़ता है |  दोष दिखाने वाले को अपना शुभचिंतक मानकर उसका आभार मानने की अपेक्षा मनुष्य जब उलटे उस पर क्रुद्ध होता है, शत्रुता मानता है और अपना अपमान अनुभव करता है, तो यह कहना चाहिए कि उसने सच्ची प्रगति की ओर चलने के लिए अभी एक पैर उठाना भी नही सीखा | 

अपने सुखो को बर्बाद कर डालने की ज़िम्मेदारी मनुष्य पर ही है | उचित प्रयत्नों की बात भुलाकर मनुष्य असुरता की ओर बढ़ रहा है |  इसी से वह दुखी है | छुटकारे का उपाय एक ही है कि वह इन पतनोंमुख दुष्प्रवृत्तियों का परित्याग करे और सदाचारी जीवन में सुख और संतोष अनुभव करे |  हमे बाह्य व्यक्ति, पदार्थ और कारण बुरे दिखाई पड़ते हैं, पर यह नहीं सूझता कि अपना दृष्टिकोण ही तो कहीं दूषित नहीं है | आत्मनिरीक्षण इस संसार का सबसे कठिन काम है | अपने दोषों को ढूंढ सकना समुद्र के तल में से मोती ढूंढ लाने वाले गोताखोरों के कार्य से भी अधिक दुष्कर है | अपने दोषों को स्वीकार कर सकना किसी साहसी से ही बन पड़ता है और सुधारने के प्रयत्न तो कोई विरला ही शूरवीर करता है | यही कारण है कि हममे से अधिकांश व्यक्ति दोषदर्शी, छिद्रान्वेषी दृष्टिकोण अपनाएँ रहते हैं और हर किसी को दोषी, निंदनीय, घृणित एवं दुर्भावनायुक्त समझते रहते हैं | परिणामस्वरूप सर्वत्र हमे दुष्टता और शत्रुता ही दीखती है | निराशा और व्यथा ही घेरे रहती है | 

How to fight with your weakness
अतः हमे इन बुराइयों, अपने अन्दर के छुपे दोष रूपी दानव को दूर करना होगा | तभी हम एक सफल, खुशहाल जीवन की परिकल्पना कर सकते हैं | इन दानव रुपी बुराइयों, दोषों को दूर करने के लिए प्रतिदिन श्रीमद्भागवत गीता का पाठ करना चाहिए | भगवान् श्रीकृष्ण के अमृत वचनों का पान करना चाहिए | और प्रेरक कहानिया, उपन्यास आदि पढ़ना चाहिए | हमारी संस्कृति, वेद, पुराणों तथा उपनिषदों को पढ़ना चाहिए जिनमे प्रोत्साहन करने वाले हजारों, लाखों  पवित्र तथ्य, प्रसंग उपलब्ध हैं |

अपनी कमजोरियों से लड़े - मजबूत बनें
अपनी कमजोरियों से लड़े - मजबूत बनें



Tuesday, May 28, 2019

एक युग प्रवर्तक कवि - डाॅ. कुमार विश्वास

कुमार विश्चास एक ऐसा नाम, एक ऐसी शख्सियत जिनके बारे में लिखना सूरज को दिया दिखाने जैसा है | आज की युवा पीड़ी के चहीते, super star, श्रृंगार रस, प्रेम रस और हास्य रस में सराबोर कवि हैं कुमार विश्वास | उनको टीवी पर, मंचों पर भारत का बच्चा सुनने के लिए लालायित रहता है | किन्तु वे जितने बड़े कवि हैं उससे कहीं ज्यादा बड़ा प्रेरणादायी उनका जीवन रहा है | हमें उनके जीवन को गहनता से पढ़ना चाहिए उनका जीवन हमे प्रेरणा देता है | आज का चमकता सूरज कुमार विश्वास विद्यार्थी जीवन में ऐसा सूरज नहीं था | वह कितनी बार असफल हुए | Engineering को अधूरा छोड़  दिया था उनकी रूचि Engineering करने में नहीं थी लेकिन घरवालो की इच्छा से Engineering में admission लिया | परन्तु बीच में ही छोड़ना पड़ा | क्योंकि उन्हें एक बहुमुखी कवि ही बनना  था | 

जीवन परिचय -
कुमार विश्वास का जन्म 10 फरवरी, 1970 को उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ियाबाद के पिलखुआ में एक मध्यवर्गी परिवार में हुआ था। उनके पिता डॉ॰ चन्द्रपाल शर्मा, आर एस एस डिग्री कॉलेज (चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ से सम्बद्ध), पिलखुआ में प्रवक्ता रहे। उनकी माता श्रीमती रमा शर्मा गृहिणी हैं। वे चार भाईयों और एक बहन में सबसे छोटे हैं। कुमार विश्वास की पत्नी का नाम मंजू शर्मा है।

कुमार विश्वास ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा लाला गंगा सहाय विद्यालय, पिलखुआ से प्राप्त की। राजपूताना रेजिमेंट इंटर कॉलेज से बारहवीं उत्तीर्ण होने के बाद उनके पिता उन्हें इंजीनियर (अभियंता) बनाना चाहते थे। डॉ॰ कुमार विश्वास का मन मशीनों की पढ़ाई में नहीं लगा और उन्होंने बीच में ही वह पढ़ाई छोड़ दी। साहित्य के क्षेत्र में आगे बढ़ने के ख्याल से उन्होंने स्नातक और फिर हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर किया, जिसमें उन्होंने स्वर्ण-पदक प्राप्त किया। तत्पश्चात उन्होंने "कौरवी लोकगीतों में लोकचेतना" विषय पर पीएचडी प्राप्त किया। उनके इस शोध-कार्य को 2001 में पुरस्कृत भी किया गया।

एक युग प्रवर्तक कवि - कुमार विश्वास
एक युग प्रवर्तक कवि - कुमार विश्वास


आधुनिकता के इस युग में, English के इस दौर में, हिन्दी माता का ये सपूत अपनी भाषा से माता के मुकुट में माणिक मोती जड़ता जा रहा है | कुमार विश्वास हर मंच पर हिन्दी में ही व्याख्यान रखते हैं |  हमारी भारतीय संस्कृति (Indian Culture) को , सभ्यता को जन जन तक पहुँचाने का काम कर रहे हैं |  आज के दौर के वे एक मात्र कवि हैं जो हमारे वेदों का, उपनिषदों का और पुराणों आदि का ज्ञान अपनी काव्य शैली के माध्यम से लोगों तक पहुंचा रहे हैं | Engineering में विफल रहा जो विद्यार्थी आज हजारों विद्यार्थियों को अपनी जादुई शैली से संबोधित कर मन्त्र मुग्ध कर देता है | 

The best motivational lecture taken by Dr. Kumar Vishwas  in Kuatilya Academy :-  कवि मंचों पर तो बहुत सुना होगा लेकिन ये lecture शायद ही सुना होगा |  विशेष || आई.पी.एस. बन्धुओं को रामायण, श्रीराम और जीवन प्रबंधन पर डाॅ. कुमार विश्वास का उद्बोधन ||


हमे उनके जीवन से सीखना चाहिए जो हमे अच्छा लगता है, जिसमे हम best कर सकते हैं जीवन में वही चुने | किसी के कहने मात्र से करने से हमे असफलता का सामना ही करना पड़ेगा | 


Monday, May 27, 2019

विद्यार्थी जीवन में ही अपना लक्ष्य निर्धारित करें

In the student life decide your Aim.
विद्यार्थी जीवन, जीवन का सुनहरा काल है | Student life is the Golden period of life.  कुछ सीखने, कुछ जानने, कुछ बनने का सतत सार्थक प्रयास इसी समय में होता है | (The best five qualities of good student.) एक विद्यार्थी के क्या लक्षण होते हैं, वह नीचे श्लोक में दिये हुए हैं | 

  काकचेष्टा वकोध्यानं श्वानिद्रा तथैव च |
 अल्पाहारी गृहत्यागी विद्यार्थी पंचलक्षणम ||

1. काक (कौआ )  चेष्टा - कौआ दूर आसमान में स्वछंद उड़ान भरते हुए भी अपनी तीव्र दृष्टि द्वारा जमीन पर पडे किसी खाद्य पदार्थ को देख चपलतापूर्वक वहाँ पहुँच जाता है तथा अपना लक्ष्य प्राप्त कर लेता है | उसी प्रकार विद्यार्थी भी ज्ञान की प्राप्ति हेतु तीव्र जिज्ञासा रखे तथा अपने लक्ष्य को प्राप्त करता चले | 

2. वकोध्यानं - वगुला तालाब या नदी के किनारे एक पैर पर खड़े रहकर ध्यानमग्न रहता है | मछली आने पर तुरंत उन्हें अपना ग्रास बनाकर पुनः ध्यानस्थ हो जाता है | विद्यार्थी भी विद्या अध्ययन में लगा रहे तथा ज्ञान-विज्ञान की बातों को ग्रहण करते हुए निरंतर प्रगति पथ पर बढ़ता रहे | 

3. श्वान (कुत्ता)  निद्रा- जैसे सोये हुए कुत्ते के पास से धीरे से गुजरने पर भी वह जग जाता है, उसी प्रकार विद्यार्थी भी अपने जीवन लक्ष्य को प्राप्त करने में सदैव सावधान व जागरूक रहे | उसकी नींद सात्विक होनी चाहिए | 

4. अल्पाहारी - विद्यार्थी जीवन साधना एवं तपस्या का जीवन है | एक अध्ययनशील विद्यार्थी सदा सादा -सात्विक तथा अल्प भोजन लेने वाला होता है | तामसिक, राजसिक तथा अधिक आहार वाले विद्यार्थी की जीवनी-शक्ति का बड़ा भाग भोजन पचाने में, नींद, आलस्य तथा तन-मन की बीमारियों का सामना करने में खर्च हो जाता है | विद्यार्थी जीवन की सफलता के लिए स्वास्थ्य के प्रकृतिक नियमों का पालन अति आवश्यक है | जो विद्यार्थी बार बार बीमार होता है वह पढ़ाई में व्यवधान के कारण विषयों के अध्ययन में पिछड़ जाता है | पढ़ाई  नियमित चलनी चाहिए | पढ़ाई में व्यवधान आने से छात्र पढ़ाई में कमजोर रह जाता है | अतः स्वास्थ्य के नियमों का पालन करते हुए उसे स्वस्थ रहना चाहिए | 

5. गृहत्यागी- एक आदर्श विद्यार्थी विद्यार्जन हेतु गृह-त्याग में संतोष करता है विद्या प्राप्त करना तप करने जैसा है, न कि मौज-मस्ती करना | सुखों का त्याग आवश्यक है | विद्यार्थी को सुख और सुखार्थी को विद्या नहीं मिल सकती है | विद्यार्थी जीवन तपस्या का जीवन है | इसमें सुख-सुविधाओं की इच्छा रखना उचित नहीं है | इस आयु में अभावों में, बिना सुख-सुविधाओं के जीवन जीने का अभ्यास कर लेना चाहिए ताकि जीवन में कष्ट आने पर उन्हें सहने का अभ्यास बना रहे | 

एक लड़का सड़क के लैम्प के सहारे पढ़ रहा था | एक परिचित ने कहा, "इतना कष्ट उठाने से तो नौकरी कर लो |" विद्यार्थी बोला, "महोदय ! आप नहीं जानते, यह मेरी साधना का, कसौटी का समय है | कठिनाई है तो क्या, बौद्धिक क्षमताएँ अब न बढ़ाई गई तो फिर ऐसा अवसर कब मिलेगा ?" इस तरह का उत्तर देने वाले महान शिक्षा शास्त्री ईश्वरचंद्र विद्यासागर थे | 

विद्यार्थी जीवन में ही अपना लक्ष्य निर्धारित करें
विद्यार्थी जीवन में ही अपना लक्ष्य निर्धारित करें

Sunday, May 26, 2019

स्वयं के अन्दर की शक्ति को पहचाने

आप में भी असाधारण शक्तियों का, मन, शरीर, आत्मा की असंख्य शक्तियों का भण्डार छिपा है | खेद है कि आप अपने को असाधारण प्राणी मानते हैं | आप कभी भी ऐसा विचार नही करें कि हम में कहाँ दिव्य और आश्चर्यमयी शक्तियाँ छिपी पड़ी होंगी | सच मानिये, आप शक्तियों का वृहद् भण्डार है |  घोड़ों को यदि शारीरिक शक्ति का ज्ञान हो जाये तो वे हमारे वाहन न रहें | हाथी अपनी शारीरिक ताक़त से विश्व को अपने वष में ही कर लें | शेर, चीता, रीछ, भैंसे, बैल, खच्चर इत्यादि पशुओं को अपनी शक्तियों का ज्ञान हो जाए तो हम पर राज्य ही करने लगे | यदि हमे अपनी शक्तियों का ज्ञान हो जाये तो हमे दुःख, भय, चिंता, आपत्ति, शोक, द्वेष आदि का बिल्कुल भी भान न हो | ये दुष्ट मनोविकार हमारा कभी भी कुछ न बिगाड़ सकें | हमारे स्वास्थ्य, मन और जीवन पर इनका कोई भी बुरा प्रभाव न हो | खेद है कि हम इन दुष्टों के आसानी से वश में आ जाते हैं और अपना सर्वनाश कर लेते हैं |

वास्तविक कमजोरी यह है कि अभी हमें स्वयं अपने ऊपर विश्वास नही है | हम दूसरों को धनवान और शान-शौक़त से रहते देख उन्हें सुखी समझते हैं, पर यदि हम उन्हें अन्दर से देखें, तो हमारे विचार बदल जाएँ | आप पूछेंगे कि लोगों के पास बहुत - सा धन है, सुख है, इतना वैभव, बड़प्पन और अधिकार है, फिर भी दुःख कैसे ? उस पर ईश्वर की बड़ा कृपा है, पर हम प्रकोप या ईश्वर कि अकृपा कैसे ? हमारे पास एश्वर्य के साधन नहीं है,  उनके बिना हम दुखी हैं और उनके पास सब साधन हैं, इसलिए वे सुखी हैं | यह आपका केवल भ्रम है | ईश्वर का इसमें कोई पक्षपात नही है | ईश्वरीय शक्तियाँ, विपुल ताकतों, मानसिक-शारीरिक-आत्मिक संपदाओं का जो अंश उनमे हैं, वही वास्तव में आप में भी मौजूद है | यह याद रखिये कि सतत परिश्रम और एक लक्ष्य सिद्धि से ही भाग्य बनता है | जनता की सतत इच्छा-साधना से देश उठता है | इच्छा एक प्रबल शक्ति है जो अपना मार्ग ख़ोज ही निकालती है | मूर्खों का प्रारब्ध एक बहाना मात्र है | वास्तव में प्रारब्ध या तकदीर कोई वस्तु नहीं है | 

जहाँ कार्य-कारण का अटूट सम्बन्ध है | वहां प्रारब्ध और तकदीर मानना मूर्खता के अतिरिक्त क्या है ? किसे विचार करने का मार्ग मालूम नहीं है ? कौन प्रत्येक कार्य के पीछे काम करने वाले कारण को नहीं जानता है ? जो अपने कल्पित भूत-प्रेतों और जीवन के तूफानों से सदा डांवाडोल रहता है, वही अपने कल्पित भूत - प्रेतों और बुरे ग्रहों का दास बना रहता है | 

इस सन्दर्भ में एक रोचक घटना याद आरही है --
राजा वसुसेन का ज्योतिष पर बड़ा विश्वास था | वे हर काम मुहूर्त से करते और हर समय अपने साथ एक ज्योतिषी सदा रखते | उन दिनों कहीं यात्रा पर जा रहे थे | रास्ते में एक किसान बीज बोने हल-बैल लेकर जा रहा था | ज्योतिषी ने कहा, "मुर्ख ! आज इस दिशा में ग्रह दशा ठीक नही  है | लौट जा नहीं तो हानि होगी |" किसान ने कहा, "मैं तो ऱोज ही खेत पर जाता हूँ | बुरी ग्रह दशा मेरा क्या कर लेगी ?" 
इस ज्योतिषी ने हस्तरेखा दिखाने के लिए कहा तो किसान ने बोला, "हाथ वह पसारे जिसे कुछ माँगना हो | मै तो आप जैसों को देकर खाता हूँ |" ज्योतिषी और राजा उसका मुँह देखते रह गये |

कभी भी विकट परिस्तिथि से हार न मानों, बल्कि जितनी भी कठिन परिस्तिथि हो, उतना ही अधिक धैर्य और उत्साह अन्दर से प्रकट करो | तरह-तरह की कोशिशें करो, कई-कई जगह काम करो | कहीं न कहीं से सफलता प्राप्त हो ही जाएगी | 

स्वयं के अन्दर की शक्ति को पहचाने
स्वयं के अन्दर की शक्ति को पहचाने



Saturday, May 25, 2019

संकल्प ही है जीवन की उत्कृष्टता का मन्त्र

यदि वास्तविकता में हम अपने जीवन में कुछ करना चाहते हैं, अपने सुनहरे सपने साकार करने चाहते हैं, आसमान की बुलंदियों को छूना चाहते हैं तो हमे अपने अन्दर सोये हुए ज्ञान को जाग्रत करना होगा | अपनी आत्मा को झकझोरना होगा तभी वह एक चरित्र का निर्माण करने में सहायक होगा | 

अन्यमनस्कता, उदासीनता और मुर्दादिली को छोड़कर ऊँचे उठने की कल्पना मनःक्षेत्र को सतेज करती है | इससे साहस, शौर्य, कर्मठता, उत्पादन, निपुणता आदि गुणों का आविर्भाव होता है | इन गुणों में शक्तियों का वह स्रोत छिपा हुआ है, जिससे संतोष, सुख और आनन्द का प्रतिक्षण रसास्वादन किया जासकता है | निकृष्टता मनुष्यों में दुर्गुण पैदा करती, जिससे चारों ओर से कष्ट और क्लेश के परिणाम ही दिखाई दे सकते हैं | संकल्प को इसीलिए जीवन की उत्कृष्टता का मन्त्र समझना चाहिए | उसका प्रयोग जीवन के गुणों के विकास के लिए होना चाहिए | 

अपने को असमर्थ, अशक्त एवं असहाय मत समझिये | "साधनों के अभाव में किस प्रकार आगे बढ़ सकेंगे" ऐसे कमजोर विचारों का परित्याग कर दीजिये | स्मरण रखिये शक्ति का स्रोत साधनों में नहीं, संकल्प में है | यदि उन्नति करने की, आगे बढने की इच्छाएँ तीव्र हो रही होंगी तो आपको जिन साधनों का आज अभाव दिखलाई पड़ता है, कल वे निश्चय ही दूर हुए दिखाई देंगे | दृढ़ संकल्प से स्वल्प साधनों में भी मनुष्य अधिकतम विकास कर सकता है और मस्ती का जीवन बिता सकता है | दीपक कब कहता है कि वह दस किलो तेल होता तो सबको प्रकाश देता | अपने सीमित साधनों से ही प्रकाश देने लगता है | 

उन्नति की आकांक्षा रखना मनुष्य का स्वाभाविक गुण है | उसे आगे बढ़ना भी चाहिए, पर यह तभी संभव है, जब मनुष्य का संकल्प बल जाग्रत हो | संकल्प के द्वारा प्रत्येक मनुष्य सफलता प्राप्त कर सकता है | एक व्यक्ति था जो अपनी पत्नि द्वारा 'महामूर्ख' कहा गया, बरती तरह तिरस्कृत और लांछित हुआ |  बात उसके गुप्त मन में लग गई | उसे बहुत बुरा लगा | उसने पत्नि को छोड़ा और बड़ी आयु में विद्या अध्ययन में लग गया | दीर्घकाल के अभ्यास और अटल संकल्प के बल से वह संस्कृत का महाकवि कालिदास बना |  समग्र भारत उसकी प्रतिभा और विद्या से चमत्कृत हो उठा | उसके गुप्त मन में काव्य शक्ति का वृहद भण्डार छिपा हुआ था |

एक डाकू था, जिसकी जीविका का उपार्जन मुसाफिरों को लूटने और हत्याएँ करने से चलता था | एक दिन एक मुनि उसकी पकड में आ गये | उसने उन्हें भी मारना चाहा, पर उन्होंने विनीत भाव से उससे कहा, "जिन व्यक्तियों को पालने के इए तुम इतने व्यक्तियों की हत्या का पाप अपने ऊपर ले रहे हो, क्या वे तुम्हारे इस पाप में हिस्सेदार बनेंगे ? जाओ और अपने परिवार वालों से पूछो |"  डाकू चला गया | उसने यह बात पूछी, लेकिन उनका उत्तर सुनते ही उसका चेहरा उतर गया | उनका उत्तर था - "हम तुम्हारे आश्रित हैं | पाप-पुण्य से हमे क्या प्रयोजन ?"  उसे ज्ञान हुआ | वह बदलकर महर्षि वाल्मीकि बन गया | उसकी गुप्त शक्तियां यकायक खुल गई | उन्होंने संसार को अपनी बुद्धि से चमत्कृत कर दिया | इसी प्रकार न जाने कितने महान पुरुष हुए हैं, जिन्हें किसी मानसिक आघात लगने से अपने गुप्त मन में सोई पड़ी गुप्त शक्तियों का ज्ञान हुआ, उनका जीवन पृष्ट बदला और वे अपने गुणों से संसार को चमत्कृत-विस्मित का गये | 

संकल्प ही है जीवन की उत्कृष्टता का मन्त्र
संकल्प ही है जीवन की उत्कृष्टता का मन्त्र


Friday, May 24, 2019

सफलता की जननी "संकल्प शक्ति"

"यह मेरा संकल्प है |" इसका अर्थ है कि अब मैं इस कार्य में प्राण, मन और समग्र शक्ति के साथ संलग्न हो रहा हूँ | इस प्रकार की विचारणा-दृढ़ता ही सफलता की जननी है | संकल्प तप का, क्रियाशक्ति का विधायक है | इसी में अनेक सिद्धियाँ और वरदान समाहित हैं | 

जिन विचारों का मनोभूमि में स्थायी प्रभाव पड़ता है और जिनसे अंतःकरण में अमिट स्वाभाव के एक अंग बन जाते हैं | ऐसे विचारों का अपना एक विशेष महत्व होता है | इन विचारों को क्रमबद्ध रीति से साने की क्रियान जिन्हें ज्ञात होती है, वे अपना भाग्य, दृष्टिकोण और वातावरण परिवर्तित कर सकते हैं और इस परिवर्तन के फलस्वरूप जीवन में कोई विशेष दृश्य या स्थिति उत्पन्न कर सकते हैं | 

आवश्यकता को आविष्कार की जननी कहा जाता है | जब किसी की तीव्र इच्छा होती है, तो उसे पूर्ण करने के लिए साधनों के लिए तलाश आरम्भ होती है, अतः कोई न कोई  उपाय भी निकल ही आता है | वह इच्छा यदि प्रेरक है, उसे पूरा करने की भूख यदि भीतर से उठी है और उसके पीछे प्राण और जीवन लगा हुआ है कि "मैं इस वस्तु को प्राप्त करके रहूँगा, चाहे कितनी ही बाधाएँ क्यों न आयें प्रयत्न निरंतर जारी रखूँगा, चाहे कितने ही निराश करने वाले अवसर क्यों न आएँ" इस प्रकार के संकल्प की यदि मन में गहरी और सुदृढ स्थापना हो जाये तो लक्ष्य तक पहुँचना बहुत सरल हो जाता है | दूसरे के लिए कठिन जान पड़ने वाला कार्य भी संकल्पवान के लिए सामान्य क्रिया से अधिक नहीं रह जाता | 

बराबर आगे बढ़ते रहने के लिए बराबर नई शक्ति प्राप्त करते रहना भी आवश्यक है | उन्नति का क्रम टूटना नहीं चाहिए | आगे बढने से रुकना या हिचकिचाना नहीं चाहिए, पर यह तभी सम्भव है, जब हमारा संकल्प, हमारा उद्देश्य अटूट साहस, श्रद्धा एवं शक्ति से ओत-प्रोत हो | आधे मन से, उदासीन होकर कार्य करने वाला फूहड़ कहा जाता है | उसे कोई विशेष सफलता मिल ही नहीं पाती | 

"अगर मुझे अमुक सुविधाएँ मिलतीं तो मैं ऐसा करता |" इस प्रकार कोरी कल्पनाएँ गढ़ने वाले आत्मप्रवंचन किया करते हैं | भाग्य दूसरों के सहारे विकसित नहीं होता | आपका भार ढ़ोंने के लिए संसार में कोई दूसरा तैयार न होगा | हम यह यात्रा अपने पैरों से ही पूरी कर सकते हैं | दूसरे का अवलम्बन लेंगे तो हमारा जीवन कठिन हो जायेगा | हमारे भीतर जो एक महान चेतना कार्य कर रही है, उसकी शक्ति अनंत है | उसका आश्रय ग्रहण करें  तो प्रत्यक्ष आत्मविश्वास जाग जायेगा | तब तुम दूसरों के भरोसे भी नहीं रहोगे | संकल्प का दूसरा रूप है - आत्मविश्वास |  

वह जाग्रत हो जाये तो अपना विकास तेजी से अपने आप पूरा कर सकेंगे | आज हम जैसे कुछ हैं, अपने जीवन को जिस स्थिति में रखे हुए हैं, अपनी निजी  विचारों के परिणाम है | जैसे विचार होंगे, भविष्य का निर्माण भी उसी तरह ही होगा | 

"हम अपनी संकल्प शक्ति को कैसे बढायें और कैसे स्वयं में संकल्प शक्ति का निर्माण करें, इसके लिए हमें अपनी संस्कृति की ओर लौटना होगा | प्राचीन काल में हमारे ऋषि मुनि तप किया करते थे, व्रत किया करते थे | यहाँ व्रत का तात्पर्य संकल्प से है न कि आज के व्रत से जो सिर्फ़ भूखे रहने के नाम पर भी आडम्बर करते हैं | हमें उन ऋषियों से, उन विद्वानों से उस संकल्प शक्ति को सीखना होगा उन्हें पढ़ना होगा | तभी हमारे अन्दर की सुसुप्त चेतना को जगाया जा सकता है | तो आइये संकल्प करें अपने लक्ष्य निर्धारण करने का | अपने जीवन के ध्येय को समझने का और साकार करें अपने सुनहरे सपने | "

सफलता की जननी "संकल्प शक्ति"
सफलता की जननी "संकल्प शक्ति"

Thursday, May 23, 2019

भगवदगीता एक दिव्य साहित्य

भगवदगीता दिव्य साहित्य है, जिसको ध्यानपूर्वक पढ़ना चाहिए | गीता शास्त्रमिदं पुण्यं यः पठेत् प्रयतः पुमान् - यदि कोई भगवदगीता के उपदेशों का पालन करे तो वह जीवन के दुखों तथाचिन्ताओं से मुक्त हो सकता है | भय शोकादिवर्जितः | वह इस जीवन में सारे भय से मुक्त हो जायेगा और उसका अगला जीवन अध्यात्मिक होगा | 
एक अन्य लाभ भी होता है :
            गीताध्ययनशीलस्य प्राणायामपरस्य च |
            नैव सन्ति हि पापानि पूर्वजन्मकृतानि च |

"यदि कोई भगवदगीता को निष्ठा तथा गम्भीरता के साथ पढ़ता है तो भगवान् की कृपा से उसके सारे पूर्व दुष्कर्मों के फलों का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता" | भगवान् श्री कृष्ण जोर देकर कहते हैं :
           सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज |
                   अहं त्वां सर्वपापेभ्यों मोक्षयिष्यामि मा शुचः ||

"सब धर्मों को त्याग कर एकमात्र मेरी ही शरण में आओ | मैं तुम्हे समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा | तुम डरो मत | " इस प्रकार अपनी शरण में आये भक्त का पूरा उत्तरदायित्व भगवान् अपने ऊपर ले लेते हैं और उसके समस्त पापों को क्षमा कर देते हैं | 
                 मलिनेमोचनं पुंसां जलस्नानं दिने दिने | 
                 सकृदगीतामृतस्नानं संसारमलनाशनम ||

"मनुष्य जल में स्नान करके नित्य अपने को स्वच्छ कर सकता है, लेकिन यदि कोई भगवदगीता-रूपी पवित्र गंगा-जल में एक बार भी स्नान कर ले तो वह भौतिक जीवन (भवसागर)  की मलिनता से सदा-सदा के लिए मुक्त हो जाता है |" 
        गीता सुगीता  कर्तव्या किमन्ये: शास्त्रविस्तरै: |
        या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपदामाद्विनि: सृता ||

चूँकि भगवदगीता भगवान् के मुख से निकली है, अतएव किसी अन्य वैदिक साहित्य को पढने की आवश्यकता नही रहती | उसे केवल भगवदगीता का ही ध्यानपूर्वक तथा मनोयोग से श्रवण तथा पठन करना चाहिए | 

भगवदगीता एक  दिव्य साहित्य
भगवदगीता एक  दिव्य साहित्य



Wednesday, May 22, 2019

दुनिया को प्रोत्साहित करने वाला पहला दिव्य ग्रन्थ : श्रीमद्‍भगवद्‍गीता

वर्तमान आधुनिक युग में लोग कस्तूरी मृग के समान यहाँ - वहाँ  भागे जा रहें हैं |  किन्तु सफलता की सोंधी ख़ुश्बू हमारे (मानव ) अन्दर ही है | परन्तु प्रश्न यह उठता है कि इस ख़ुश्बू को पहचाने कैसे ? कोई तो बताये इस सफलता की ख़ुश्बू के लक्षण के बारे में |  आज हम सफलता के , और आधुनिकता के आडम्बर में इतना आगे निकल आये कि अपनी संस्कृति , सभ्यता को दिन - प्रतिदिन  बहुत पीछे छोड़ते जा रहें हैं | किन्तु इस नयी पीढ़ी को ये ज्ञात भी नहीं है कि भारतीय संस्कृति में, भारतीय सभ्यता में , भारत के वेदों में , भारत के उपनिषदों में समुद्र रूपी विशाल ज्ञान-विज्ञान  छुपा है | हिन्दू संस्कृति में माणिक मोती वेदों के रुप में छुपे हुए हैं | और ये पश्चिमी सभ्यता और नए उपक्रमों में अपना ज्ञान और अपनी सफलता खोज रहें हैं |

 जागो, पढ़ो और पहचानों  अपनी सभ्यता को, अपनी संस्कृति को और अपने वेदों को |  "हिन्दू संस्कृति का सबसे पहला प्रोत्साहित करने वाला दिव्य ग्रंथ  श्रीमद्भगवद्गीता " जिसमें पहले पृष्ठ से ही ज्ञान की अमृत वर्षा प्रारम्भ हो जाती है और जैसे जैसे गीता के दिव्य पृष्ठों उलटते हैं ज्ञान की रिमझिम बारिश  और तेज हो जाती है |  ऐसे दिव्य ज्ञान की बारिश में सराबोर होने के पश्चात् किसी और ज्ञान सामग्री की आवश्यकता ही नहीं रहेगी और न ही किसी और के प्रोत्साहन की आवश्यकता होगी |  

      विश्व धनुर्धर अर्जुन युद्धक्षेत्र में अपने सगे -संबन्धियों को देखते ही ऊर्जाहीन हो गया था, उसके भौतिक ज्ञान का दीपक बुझ सा गया था | और अज्ञानताबस  उसने अपना प्रिय धनुष गाण्डीव किनारे रख दिया | तब भगवान्  श्री कृष्ण ने उस के लिए  स्वयं से  हारे हुए अर्जुन को ये दिव्य ज्ञान की अमृत वर्षा की जो हमारे लिए आज इस कलयुग में भी सहज ही उपलब्ध है किन्तु हम पढ़ना नहीं चाहते है | और आश्चर्य की बात ये है कि पश्चिमी सभ्यता के लोग गीतासार का बहुतायत में पाठन कर रहें हैं परन्तु भारत के लोगो सिर्फ आडम्बर को गृहण कर रहें हैं | 
 
विश्व साहित्य में श्रीमद्भगवद्गीता का अद्वितीय स्थान है | यह साक्षात् भगवान् के श्रीमुख से निःसृत परम् रहस्यमयी दिव्य वाणी है | इसमें स्वयं भगवान् ने अर्जुन को निमित्त बनाकर मनुष्यमात्र के कल्याण  उपदेश दिया  है | इस पवित्र ग्रन्थ में भगवान् ने अपने हृदय  के बहुत ही विलक्षण भाव भर दिए हैं, जिनका आजतक  कोई पार नहीं पा सका  और न ही पा सकता है |  


दुनिया को प्रोत्साहित करने वाला पहला दिव्य ग्रन्थ : श्रीमद्‍भगवद्‍गीता
दुनिया को प्रोत्साहित करने वाला पहला दिव्य ग्रन्थ : श्रीमद्‍भगवद्‍गीता

Tuesday, May 7, 2019

पाक पाक चिल्लाकर आया महीना ये रमज़ान...

हर मस्जिद पर पांचों वक्त की
होने लगी अज़ान,

बकरे-बकरी, गाये-भैंसो की
चिंताए बढ़ना था आसान,

पाक पाक चिल्लाकर आया
महीना ये रमज़ान,

खूब सबूत दिए कितना पाक है 
जब काटे लाखों मासूम-बेजुबान,

अम्मा कट रही निर्ममता से
अम्मा अम्मा कहकर खूंटे पर तड़प रही संतान,

कल तक पाला बेटो-बेटी जैसे
आज बनाकर पेट के अंदर जैसे इक पकवान,

जब जब रेती मासूमों की गर्दन
सिसकती है गीता पर क्यों मौन रही है कुरान,

सच में इतना निर्दयी अल्लाह है ?
जहाँ से पूछ रहा भगवान्

ये पाक है फिर नापाक क्या है 
खुदा को बतला ऐ मूरख इंसान  |


पाक पाक चिल्लाकर आया  महीना ये रमज़ान...
पाक पाक चिल्लाकर आया  महीना ये रमज़ान...