Saturday, February 2, 2019

गलतफ़हमी थी जो रिश्तों को ...( Ghazal )

गलतफ़हमी थी जो रिश्तों को
मजबूत समझा,
ये तो रेशम से भी
नाजुक निकले ।

कसूर बस इतना कि
अपना हक माँग बैठे
पता चला अपनों के
लिवाज़ में साँप निकले ।

साफ - सुथरे तन
बस देखने के
सीनों में सब दिल
काले निकले ।

उनकी नियत बदलना
काबिले तारीफ है,
रंग बदलने में अपने
गिरगिट से भी माहिर निकले ।

खंजर घोंपने का अंदाज भी
निराला है अपनों का
न उखड़ती है साँस
कम्बख्त न ही दम निकले ।

कैसे करूं ऐतबार
इन अपनों पर
झाँक कर देखा इनके दिलों में
उफ्फ...ये सब दुश्मन निकले ।
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 गौरव हिन्दुस्तानी

#Poem, #Feelings, #Emotions


गलतफ़हमी थी जो रिश्तों को ...

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Gaurav Hindustani

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