Saturday, February 2, 2019

चन्द शब्दों को ढूँढने ...( Hindi Poem )

चन्द शब्दों को ढूँढने
मैं घूमने निकला,
खुशनसीबी देखो
मुझे गज़ल मिल गई ।

कुछ बिखरी यादों को
मैं जोड़ने बैठा,
इस काम को साझा करने में
उन्हें भी फुर्सत मिल गई ।

कब से बैठा था
गरीबी का खाली बर्तन लिए,
तुम आयीं तो
मोहब्बत की दौलत मिल गई ।

दरवाजे सब बन्द थे
तेरे दीदार पाने के,
खुशनसीबी देखो
कमरे की खिड़की खुली मिल गई ।

कुछ इस तरह हुआ
दीदार तेरा
भटके हुए मुसाफिर को
मंजिल मिल गई ं।

सुबह-शाम देखता बाट राधा की
यमुना तट पर,
बाँसुरी की धुन सुनकर
कान्हा की राधा को सुध मिल गई ।

वो उसके सितमों को
लवों पे लिये बैठी रहती
उम्दा है ज़ालिम से
उसके होठों पे तबस्सुम मिल गई ।

वो उतर जाती मेरी धड़कनों में
कुछ तरानों की तलाश में,
नफरत में मुझ वेबफा से
उसको सीठी तरन्नुम मिल गई ।

हार जाता आशिक मोहब्बत में
घर के हर शख्स को,
अच्छा हुआ जो
वेबफा की हकीकत मिल गई ।

दीवाना ज़िद लिये बैठा रहता
काँटों पर चलकर तेरे घर आने को,
अच्छा हुआ जो तेरे गाँव की सड़क
उसके शहर से मिल गई ।

सबकी चाहत थी
कोई तो खेले इस क्वाँरे आँगन में,
करिश्मा कुदरत का देखो
सूने आँगन को बेटी मिल गई ।

ज्यादा नहीं एक युग बीता होगा
तेरे इन्तजार में,
थोड़ा इन्तजार और करूँगा तेरे आने का
तेरे कदमों की मुझको आहट मिल गई ।

अरसे से बैठा है मासूम
एक निवाले की आस में,
तकदीर की सौगात देखो
आज उसको पूरी रोटी मिल गई ।

बेटा है सरहद पर
बन्दूकों के साये में,
पर वो जिन्दा है सुनकर
माँ को तसल्ली मिल गई ।

सहमी रहती है बेटी
ससुराल के जुल्मों सितम से,
कितना खुश है पिता
उसके आने की खबर मिल गई ।

सरे बाजार में लुट जाती
इज्ज़त उसकी,
शुक्र है कि उसको
ज़हर की शीशी मिल गई ।

बेंच देता वो खुद को
घर की गरीबी मिटाने में,
वक्त सही घूमा कि
उसको नौकरी मिल गई ।

जल जाती बहू
दहेज की आग में,
खुश हूँ ससुराल को
दहेज की देवी मिल गई ।

कब से खड़ा है
दरवाजे पर इक खुराक की खातिर,
रहमत है खुदा की
भिखारी को भीख मिल गई ।

अकेली ही सिसकती
वो बन्द कमरे में,
शुक्र है उसको
नयी सहेली मिल गई ।

बुझ जाते वो चराग
हमेशा के लिए,
किस्मत है चरागों को
रौशनी मिल गई ।

फिर मर जाता किसान
सूखे खेतों को देखकर,
प्रकृति की देन से
प्यासी फसल को वारिश मिल गई ।

बदसूरती की बदौलत
लड़की क्वाँरी ही रह जाती
लेकिन शिव के व्रतों से
उसे डोली मिल गई ।

सड़जाती वो लाश
किसी चैराहे पर,
देर से ही सही
पर सजी अर्थी मिल गई ।

सदियों से सोता रहा परिवार
सर्दी भरी खुली रातों में,
सुकूं है कि अब जाकर
इसे एक छत मिल गई ।

अभी और काला करता मुँह
भ्रष्टाचार की कालिख से,
बदनसीबी जनता की
नेता को कुर्सी मिल गई ।
     
कहाँ भटकता मैं नमाज़ी
अल्लाह की तलाश में
बेहतर हुआ रास्ते में
मेरी अम्मी मिल गई ।

मार-पीटकर निकाल देते
घर से सब उसको ,
 चलो पहली तारीख में
बूढ़ी दादी को पेन्शन मिल गई ।

थोड़ी देर और होती तो
चेहरा न देख पाता पिता का,
गनीमत है बेटे को
दर्द भरी चिट्ठी मिल गई ।

हफ्तों से लगा है कर्फ्यू, कैद
बच्चे भूखे बिलखते नजर आये
कुछ पल की पुलिस की सख्ती में
घरों से निकलने की मौहलत मिल गई ।

सलाखों में है सास, बहू
जलाने के झूठे आरोप में,
गवाही से न सही पर रिश्वत से
बेगुनाह को जमानत मिल गई ।

कैसे लिखती सूखी कलम
गीता के श्लोक और कुरान की आयाते,
पाक-ऐ-मजहब से
कलम को दवात मिल गई ।

टूट जाते तार साँसों के
नन्ही भ्रूण के अस्पताल में,
अचानक औरत को अपनों से
लड़ने की ताकत मिल गई ।

घुमाती रहती कुम्हारिन
सूना चाक अपना,
इसकी ज़िद से कुम्हार को
चिकनी मिट्टी मिल गई ।

आज भी चूल्हा
बुझा का बुझा रह जाता,
पड़ोसी के चूल्हे से
अधजली लकड़ी मिल गई ।

गिर-गिरकर बूढ़ा यूँ ही
जख्मी हो जाता,
लड़खड़ाते की सहारा
उसको लाठी मिल गई ।

आज भी नहीं बचा पाती
माँ, बेटी को बाप की मार से,
गनीमत है बेटी के सीने पर
पड़ी चुन्नी मिल गई ।

बाज झपट लेता
मासूम फाख्ता को,
कर्म है कि अपने झुण्ड को पाकर
उसे लड़ने की हिम्मत मिल गई ।

बार-बार गश खाकर
गिर जाती वो मासूम की याद में,
मुद्दत के बाद उसको
खोई हुई बच्ची मिल गई ।

मंहगाई में तड़पता रह जाता
कैंसर का मरीज,
रहम है सरकारी अस्पताल में
दवा सस्ती मिल गई ।

मशरूफ रहता वो ताउम्र
अपनी मुफलिसी में,
हसरत-ऐ-कामयाबी में
उसको शौहरत मिल गई ।

 सारे लड़के छोड़ जाते गाँव
अपनी तरक्की की खोज में,
शुक्रिया प्रधान का लड़कों को
गाँव में ही तरक्की मिल गई ।

माँ की तरह वो भी
अनपढ़ रह जाती,
खुशी है पिता से स्कूल जाने की
बेटी को इजाज़त मिल गई ।

धुँधली आँखे कैसे देखती
चेहरा अपने लहू का,
पोते की दुआओं से
दादा को ऐनक मिल गई ।

बददुयायें अपनों की
उसका जीना दूभर कर देतीं,
सदाओं में गैरों से उसको
जीने की दुआ मिल गई ।

सूख जाता वो पौधा
काले अँधियारों में,
शुक्र है कुदरत से
उसे धूप मिल गई ।

तड़पती आत्मा बन्द अलमारी की
सजी मटकी में,
धन्यवाद पवित्रता का
अस्थियों को गंगा मिल गयी ।
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 गौरव हिन्दुस्तानी

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Gaurav Hindustani

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