Thursday, January 17, 2019

गज़ल

मुझको तो रिश्ते ही दौलत थे,
जाते जाते साल तुमने वो भी छीन लिए |

समझाया बहुत दिल को सगा कोई नही,
फ़िजूल बैठा है तू यादें महीन लिए |

यहाँ तबस्सुम का कोई तलबगार नहीं,
उसको कौन पूछे जो फिरता है शक्ल ग़मगीन लिए |

रोता है, सिसकता है आंखे सुर्ख करता है ख़ुदा जाने,
पर मिलता है बेबफ़ा मुझसे आंखे सुरमईन लिए |

अरसे से ताकता है रास्ता "गौरव" उसका ऐसे,
जैसे कोई फ़रिश्ता बैठा है तोहफे बेहतरीन लिए |
.
.
.
.
गौरव हिन्दुस्तानी

गज़ल



Share This
Previous Post
Next Post
Gaurav Hindustani

My name is Gaurav Hindustani. I am web designer by profession, but I am author by heart so Hindustani Kranti is a platform for all Authors and poets who write GOLDEN words and have special stories and poetries. You can send any time your words to me at gauravhindustani115@gmail.com.

0 comments: