Tuesday, January 29, 2019

एकाकी जीवन..

एकाकी जीवन की क्यों कहूँ सिर्फ व्यथा
जब हो रही ही हो विकसित कोई नई कथा।

जीवन डगर का सूनापन लगे जैसे ढलता सूरज है
अगला ही क्षण स्वर्निम किरण लिए उगता सूरज हैं ।

सच हैं कि ,उजाले से दूर अंधेरे मे उलझते हैं
फिर  तारा बन अम्बर मे  वहीं तो चमकते हैं।

जब अकेला मन लेता है हृदय मे अंगड़ाई
तभी मन मे नवीन स्वप्न भरती है किलकारियां।

जब जिंदगी सिकुड़ती है स्वयं के अंत:स्थल मे
द्वंद है कि छू लूँ आसमां  या खो जाउ अनंत धरातल मे।

हाँ तन्हा जीवन मे आया  जरूर कोई ठहराव है
सच मानो दु:खद नहीं ये सुखद कोई  पड़ाव है।

जहाँ आकर होता है हर कोई स्वयं से रूबरू
जान लूँ स्वयं को इससे बङा न कोई आरजू।

जिंदगी के हर पड़ाव पर मिलती सीख विशेष हैं
हारी नहीं हूँ तब तलक मैं जब तक साँसे आशेष है।


ज्योति झा
शिक्षा-एम.ए (हिन्दी)
साहित्यिक उपलब्धि-विभिन्न साहित्यिक मंच पर काव्य पाठ।
निवास-कोलकाता।


ज्योति झा



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Gaurav Hindustani

My name is Gaurav Hindustani. I am web designer by profession, but I am author by heart so Hindustani Kranti is a platform for all Authors and poets who write GOLDEN words and have special stories and poetries. You can send any time your words to me at gauravhindustani115@gmail.com.

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