Sunday, September 30, 2018

आत्मकथा : पहला भाग (महात्मा गाँधी)

१.जन्म

जान पड़ता है कि गाँधी - कुटुम्ब पहले तो पंसारी का धंधा करने वाला था | लेकिन मेरे दादा से लेकर पिछली तीन पीढ़ियों से वह दीवानगीरी करता रहा है | ऐसा मालूम होता है कि उत्तमचंद गाँधी अथवा ओता गाँधी टेकवाले थे | राजनीति खट्पटके कारण उन्हें पोरबंदर छोड़ना पड़ा था, और उन्होंने जूनागढ़ राज्य में आश्रय लिया था | उन्होंने नवाब साहब को बायें हाथ से सलाम किया | किसी ने इस प्रकट अविनय का कारण पूछा, तो जवाब मिला : "दाहिना हाथ तो पोरबंदर को समर्पित हो चुका है |" 
ओता गाँधी के एक के बाद दूसरा यों दो विवाह हुए थे | पहले विवाह से उनके चार लड़के थे और दूसरे से दो | अपने बचपन को याद करता हूँ , तो मुझे ख्याल नहीं आता कि ये भाई सौतेले थे | इनमे पाँचवे करमचन्द अथवा कबा गाँधी और आखिरी तुलसीदास गाँधी थे | दोनों भाईयों ने बारी बारी से पोरबंदर की दीवानगीरी छोड़ने के बाद वे राजस्थानिक कोर्ट के समय वे राजकोट दरबार के पेंशनर थे |
कबा गाँधी के भी एक के बाद एक यों चार विवाह हुए थे पहले दो से दो कन्यायें थीं ; अन्तिम पत्नि पुतलीबाई से एक कन्या और तीन पुत्र थे | उनमें अन्तिम मैं हूँ | पिता कुटुम्ब - प्रेमी , सत्य - प्रिय , शूर , उदार, किन्तु क्रोधी थे | थोड़े विषयासक्त भी रहें होंगे | उनका आखिरी ब्याह चालीसवें सालके बाद हुआ था | हमारे परिवार और बाहर भी उनके विषय में यह धारणा थी कि वे रिश्वतखोरी से दूर भागते हैं और इसलिए शुद्ध न्याय करते हैं | राज्य के प्रति वे बहुत वफादार थे | एक वार प्रान्त के किसी साहब ने राजकोट के ठाकुर साहब का अपमान किया था | पिताजी ने उसका विरोध किया | साहब नाराज हुए , कबा गाँधी से माफ़ी माँगने के लिए कहा | उन्होंने माफ़ी माँगने से इन्कार किया | फलस्वरूप कुछ घंटों के लिए उन्हें हवालात में भी रहना पड़ा | इस पर भी जब वे डिगे नहीं तो अंत में साहब ने उन्हें छोड़ देने का हुक्म दिया .....
mahatma gandhi ji



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Gaurav Hindustani

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