Sunday, September 30, 2018

आत्मकथा : पहला भाग (महात्मा गाँधी)

१.जन्म

जान पड़ता है कि गाँधी - कुटुम्ब पहले तो पंसारी का धंधा करने वाला था | लेकिन मेरे दादा से लेकर पिछली तीन पीढ़ियों से वह दीवानगीरी करता रहा है | ऐसा मालूम होता है कि उत्तमचंद गाँधी अथवा ओता गाँधी टेकवाले थे | राजनीति खट्पटके कारण उन्हें पोरबंदर छोड़ना पड़ा था, और उन्होंने जूनागढ़ राज्य में आश्रय लिया था | उन्होंने नवाब साहब को बायें हाथ से सलाम किया | किसी ने इस प्रकट अविनय का कारण पूछा, तो जवाब मिला : "दाहिना हाथ तो पोरबंदर को समर्पित हो चुका है |" 
ओता गाँधी के एक के बाद दूसरा यों दो विवाह हुए थे | पहले विवाह से उनके चार लड़के थे और दूसरे से दो | अपने बचपन को याद करता हूँ , तो मुझे ख्याल नहीं आता कि ये भाई सौतेले थे | इनमे पाँचवे करमचन्द अथवा कबा गाँधी और आखिरी तुलसीदास गाँधी थे | दोनों भाईयों ने बारी बारी से पोरबंदर की दीवानगीरी छोड़ने के बाद वे राजस्थानिक कोर्ट के समय वे राजकोट दरबार के पेंशनर थे |
कबा गाँधी के भी एक के बाद एक यों चार विवाह हुए थे पहले दो से दो कन्यायें थीं ; अन्तिम पत्नि पुतलीबाई से एक कन्या और तीन पुत्र थे | उनमें अन्तिम मैं हूँ | पिता कुटुम्ब - प्रेमी , सत्य - प्रिय , शूर , उदार, किन्तु क्रोधी थे | थोड़े विषयासक्त भी रहें होंगे | उनका आखिरी ब्याह चालीसवें सालके बाद हुआ था | हमारे परिवार और बाहर भी उनके विषय में यह धारणा थी कि वे रिश्वतखोरी से दूर भागते हैं और इसलिए शुद्ध न्याय करते हैं | राज्य के प्रति वे बहुत वफादार थे | एक वार प्रान्त के किसी साहब ने राजकोट के ठाकुर साहब का अपमान किया था | पिताजी ने उसका विरोध किया | साहब नाराज हुए , कबा गाँधी से माफ़ी माँगने के लिए कहा | उन्होंने माफ़ी माँगने से इन्कार किया | फलस्वरूप कुछ घंटों के लिए उन्हें हवालात में भी रहना पड़ा | इस पर भी जब वे डिगे नहीं तो अंत में साहब ने उन्हें छोड़ देने का हुक्म दिया .....
mahatma gandhi ji



Friday, September 28, 2018

एक कलाकार को तूलिका मिल गयी

एक कलाकार को तूलिका मिल गयी,
जैसे प्रेमी को एक प्रेमिका मिल गयी।

कविता लिखने को भी प्रेरणा चाहिये,
आज सौभाग्य से नायिका मिल गयी।

कितनी मिलती रही गोपियाँ क्रष्ण को,
मिल गयी शान्ति जब राधिका मिल गयी।

कह सके अपने मन की बात जिससे ए "वीर",
आज मुझको वह ऐसी "सारिका" मिल गयी॥

कविवर
सत्यवीर सिंह गुर्जर


ek kalakar ko
Satyaveer Singh Gurjar

Thursday, September 27, 2018

माँ आप सुदामा ..

माँ आप सुदामा और प्रियंका
सांवरे सी दिखती हैं ,
आप हो वास्तविक रूप देवी का
ये आपकी परछाई ही लगती हैं |

हर पुस्तक से इनका ज्ञान अलग
हर माटी से इनका निर्माण अलग
प्रश्न करती है कलम ये मेरी
आप स्त्री नहीं कोई शक्ति ही लगती हैं |

आप शान्ति स्वरूपा देवी हो
इनके चेहरे पर ख़ामोशी है
आप वीणा-वादिनी माँ हो
ये मधुर संगीत सी बेटी हैं |

अचल धैर्य प्रदान इन्हें किया  आपने
विपत्ति में भी ये न विचलित होती हैं
आप अनन्त ज्ञान का दीपक हैं
ये अमर ज्ञान की  ज्योति हैं |



बनारस महका आपकी सुगन्ध से
इन्होंने बरेली में वही सुगन्ध बिखराई है
आप विशाल वृक्ष हो जिस घर की
ये उस आँगन की तरुणाई हैं |

इनकी प्रियतमा हैं बस पुस्तकें
आपको प्रिय अपनी प्रीति
दीर्घ आयु  आप दोनों की हो इतनी
जब तक ये दुनिया जीती |

आप पुष्प ये सुगन्ध
सी  लगती हैं
आप नयन हो ये आपकी
द्रष्टि ही लगती हैं |

माँ आप सुदामा और प्रियंका
सांवरे सी दिखती हैं ,
आप हो वास्तविक रूप देवी का
ये आपकी परछाई ही लगती हैं |



इन्हें ज्ञान की माला दे दी
मुझ मूर्ख को एक मोती दे दो
शीष झुकाकर आपके चरणों में वन्दन मेरा
मुझे आपना आशीष दे दो |

फैलाऊ उजियारा कविताओं के शीष महल में
बस ऐसी मुझको एक कलम दे दो

गौरव हिन्दुस्तानी


माँ आप सुदामा ..

बीते चारो साल लो भैया..


बीते चारो साल लो भैया
बीते चारो साल
कम्पलीट हुआ बी.टेक ,अब लेकिन
नौकरी का बड़ा बबाल |

फर्स्ट सैम गुजरा था जानने में ,
एक-दुसरे का हाल , और
सेकंड में एम.ई ,ई.सी.
लायी थी भूचाल |
बीते चारो साल लो भैया ........ |

सहम गये थे सबके सब
जानने के अपने परिणाम
बैको की जब झड़ी लगी तो
आधे थे उस पार ,
रोते-रोते फूली अँखियाँ
चेहरे हो गये लाल |
बीते चारो साल लो भैया ........ |

थर्ड – फोर्थ बीता था बड़िया
ये हुआ था  एक कमाल ,
एक – दो की बस बैक लगी थी
बेड़ा हो गया पार |
बीते चारो साल लो भैया ........ |

डा की एल्गो न चली रे कुछ से ,
और कुछ को जावा लगी कमाल ,
आकाश सर ने जब थामी उंगली
तब आई जान में जान |
लय में आये सब अपनी –अपनी
लेकर तीर कमान ,
कर – देंगे बैक की ऐसी – तैसी
ली दिमाग में ठान |
बीते चारो साल लो भैया ........ |

संभल- संभल कर कदम रखा
फिर मिली एक चट्टान ,
एल्गो-पे-एल्गो भरी पड़ी  थी
नाम कम्पाइलर डिजाईन |
अब शैशब सर बने सारथी
ले गये रथ उस पार ,
जब आंखे हम सबने खोली ,
मिली ये चौथी साल |
बीते चारो साल लो भैया ........ |

चन्द्र (राकेश सर ) पडाते पी.ए. हमको
देते सूर्य (रवि सर ) वेब डिजाइनिंग का ज्ञान
अंकुर सर की डांट बनाती
हमारी क्लास को शमसान ,
फिर अमीन सर के  आने से
सब हो जाते खुशहाल |
बीते चारो साल लो भैया ........ |

अब आया अंतिम सेमेस्टर
बेरोजगारी का करता शोर ,
हौले-हौले कदम बढ़ाते ,
बड़ते मंजिल की ओर |
आरिफ़ सर ने जब छोड़ी उंगली ,
घेरता हमको अँधियारा ,
ज्योति मैडम की ज्योति से मन में ,
फिर हुआ नया उजियारा |

सुमित मैडम की बाते सबको
लगती प्यारी-प्यारी ,
पी.डी.पी. के वो गुण सिखलाती ,
हम सबको बारी – बारी |

Are you Getting My Point से
एंट्री होती सक्सेना सर की ,
पार्टी-पार्टी हम सब चिल्लाते ,
क्लास में पाठक सर की |
बिछड़ेंगे ये सब ,छूटेंगे  ये सब ,
नम करता मेरी आँखों को
अक्सर  यही ख्याल |
बीते चारो साल लो भैया ........ |

गौरव हिन्दुस्तानी विनती करता है
दोनों जोड़े कर ,
माफ़ कर  देना मेरी भूलो को
सिस्टर और ब्रोदर |


गौरव हिन्दुस्तानी 

बीते चारो साल लो भैया..

An Epoch

"An Epoch " 
During the stirring spring
I walked a thousand miles ..., 
Ran after the dream of wings Silently budding in my eyes. 
Dreamt up to be beautified With the glaze of twinkling stars. 
Extended the fervent arms 
To touch the starry skies.
During the overflowing summer, 
Flood composed the fatal history of lost, 
The dreams were crushed in bud 
With the sparky bolts of roaring thunders, 
The fragments of broken dreams 
Swirled away on the flow of tears.
During the opulent autumn, 
The pinky buds about to blossom, 
The wind conceived the mixed fragrance of flowers, 
The foamy clouds canopied the sky. 
By pulling the foggy veil The sun smiled with joy.. 
The fresh morning commenced a new epoch, 
With the promising days of happiness.
Poetess : Sabina Sabnam Alia

Qualification : M. A in English 
Literary achievement : 
1.Best junior friction writer award in Assam. 
2. Published a novel "Nishar Ninad"
3.Poems, short stories, novels are publishing in different local, national and international magazines. 


Sabina Sabnam Alia

Wednesday, September 26, 2018

The Holy Doctrines of Dancing Fire

The Holy Doctrines(1)
Based on the spirit of universal fraternity  and being kind to others,under the permit of the  imperialest god of heaven,I,the  spokesman of the god,started this brandnew religion of common world   for the benefits of ordinary people of this world.
The starting point for creating this new religion is relieving the suffered spirits from torture in their
mind and the hostilities between people in this world.Only if there is bloody wars for contemptible aims,   or hostility owing to tiny dirty things,our doctrines of holy religion born on this day has the value and       reason to last.
Higher than your head,in the space in the air,there is a golden heaven radiating sacred and pure       glow.At the back of this heaven,an elder who enjoy high prestige and command universal respect lives    in a blue temple.In one night,he taught his splendid doctrines to me in a dream.And now I will declare       these immortal doctrines to all of you in this mortal world.
Believe me,enjoy immortal life!
Chapter one  Going through fire and water
That means defying all difficulties and dangers.
Under the name of all those pious adherents,with the silent agree of god,I call my religion "Going       through fire" or "Dancing fire".
In the long long history of human kind,the fire has been playing an important part in stimulating the     development of human themselves and human society.In the early days of human being,people could     not understand fire.People couldn't take use of fire.Then one day,people occasionally tasted the toasted body of wild animals by lightning fire.They began to realize the advantage of taking use of fire.Because   the food cooked with fire can effectively stimulate the assimilation of nutritions in the food,the thinking    power of human kind was greatly enhanced.With the consistant support of nutritions,the genius and        intelligence was inspired.As a consequence,the civilization containing ethics,industry,arts prosper.To       make a conclusion,the fire is the stimulus of human civilization.
In the well-known Greek Mythology,there is a remarkable story about the coming of fire.The father     of gods Zeus forbade ordinary people to use fire in the beginning.A god named Promethus defied the      order of Zeus because he was pitious of human being.

The Holy Doctrines(2)
He stole the fire from the Olympics to the ordinary world.From then on,humans can have the advantage of using fire.But Promethus was severely punished by Zeus.Luckily,the fire-stealer was set free by  Hercules,a hero of human being.
The fire,as the symbol of brightness,has many auspicious meanings.In the folks of China,fire is believed to bring prosperity,good luck and glory to people.In the nations along the Black Sea,people tend to adore fire.The fire,with its red or golden color,is surely to bring fortune,positive energy, quietness and happiness to us.
All above is the reason why I give the name "fire"to this newly-born belief.
Chapte two  Interests 
The bustlings of the people of the world are for the vanity of heart.If we open our heart for the bright clear state of mind,chasing the height and purity of heart,we can be undisturbed by the worry and folly of the material world.The distance between an ordinary person and a saint is a change of his heart.How miraculous!
The significance of life is mastering one's own destiny and realizing the freedom of own will with the limited power of one's brain and strength.Happiness is the objective of all man 's lives.To generalize the achievments and conclusions people before,happiness is divided into two types:the higher happiness,that is to say the pleasure with significance and the lower happiness,namely just joy.The realm of one's spirit is higher or lower.Someone always lives in the pleasure of his or her own life.But people with the universal fraternity pursure the happiness of the human kind or the whole society.The essence of our doctrines is to guide people with goodwill to live and to labour for the happiness of other people. There is a boundary in people's dreamland.In this dreamland,people help each other selflessly.When one family has food to feed themselves,their neighbours have food to feed themselves too.People live near each other treat other people as their brothers and sisters.People cherish a love for the happiness and sorrow of their neighbours.All the people care for each other.   (Ocotober 7th)

The Holy Doctrines(3)
Chapter three  Calmness Kungfu
Calmness is a state of mind when astonishing or exceptional situations happen,that person keeps undisturbed in mind and remains the same facial expression.Of all those superbly practiced Kungfus,the levels of different people have reached various extent.Just as a child may be calm at some a little bit  less happening situations because he or she accidentally had some similar experience before long.To be calm at some extent is an easy way of most people.But to behave calm in almost all the time is treasurable in common people.Most probably,this kind of people have experienced the ups and downs of human world.They have witnessed too many things in their life:strange,stunning,exceptional,horrible or extremely pleasant occasions.And maybe even sad,depressing,painful emotions have struck them no less than once.But they have safely passed these gray lives.So when they come to face a little exceptional things,they are strong enough to hold calmess in their mind.Without much ado,they live a peaceful life undisturbed by this ordinary world.
Chapter four A challenge for EQ: Self-appreciation
Weighing the maturity extent in mind of a person,we just need to observe whether that person is or not confident enough.According to the research of psychology,if a person think him or her is good enough for everything in his or her life,that person tend to be more competent than when  he don't think this way.That proves the benefits of living in a positive or say confident way.
People with high credits of EQ are capable of managing his emotions dealing with their relationship with others in their living circle well.Being confident is a positive way of self -management.Being self-appreciative is a high-profile manifestation of confidence.Based on these things,I say self-appreciation is a challenge for one's EQ.
You are the only one who can change yourself.To change yourself for better,starting from being confident.Everyone can find some advantages in their characters or living styles.Searching them in your mind,you will find that there are abundant of characteristics in yourself worth being proud of.So,you might as well be self-appreciative.

Written By :

Joey from China


The Holy Doctrines of Dancing Fire

तुम बेफिजूल ना कहना

इनके उमंग को तुम बेफिजूल ना कहना
इन युवा को तुम कोमलांग ना समझना।

ये चाहे तो पत्थरों मे गहरी सुरंग खोद दे
या ये चाहे तो दुश्मनों पर हल्ला बोल दे

ये चाहे तो देश की सत्ता का रंग बदल दे
या ये चाहे तो हिमालय पर तिरंगा लहरा दे

इनके उमंग को तुम बेफिजूल ना कहना
इन युवा को तुम कोमलांग ना समझना।

ये परम पुरूषार्थी और तेज बलवान है
ये धीरंगभीर है और कहलाते महान है

ओत-प्रोत जोश से,युवा देश के प्राण है
उठ आगे बढते करते योवन बलिदान है

इनके उमंग को तुम बेफिजूल ना कहना
इन युवा को तुम कोमलांग ना समझना।


ज्योति झा
शिक्षा-एम.ए (हिन्दी)
साहित्यिक उपलब्धि-विभिन्न साहित्यिक मंच पर काव्य पाठ।
निवास-कोलकाता।

JYOTI JHA

Tuesday, September 25, 2018

HOW TO DEVELOP CREATIVITY

1. Read everything you can find! 
Let’s start with the obvious one! Read a lot! Read anything you find lying around your house from old story books to newspapers. While reading this stuff, pay attention to the words being used by the writer, use of metaphors, adjectives, characters, the plot, the conflict in the story etc. If you come across a word you don’t understand, use a dictionary to find its meaning and then practice using it in a sentence to gain a better understanding of that word. 

2. Find inspiration in everyday things. 
The world around you is full of interesting events. Go for a walk and ask yourself questions, such as what is that person doing? What is that dog looking at? Why are those people arguing? Write a summary of something that is happening on the TV or a video game you just finished playing. Write about everything and anything you see, hear, smell or feel! You’ll be surprised at what pops up in your head. 

3. Use writing prompts to inspire you. 
There are tons of resources on the internet that can inspire you, in magazines, newspaper headlines and any other words you find lying around. 

4. Criticise the work of others. 
When reading a book, try to identify the flaws in that story and list a couple of improvements. Also, note down the best parts of that story, what did you enjoy while reading that book? This can help you to understand the elements of a great story and what to avoid when writing. You can aim to do weekly or monthly book reviews on the books you read. Soon you’ll be able to master the secrets of great creative writing like a master!

5. Keep a journal and write something in it every day. 
Even if you think your life is boring and nothing interesting ever happens in it. You can write about your goals and inspirations or what you did for lunch today. Anything is better than nothing! One day you’ll look back at these notes and they’ll inspire you to write an awesome story – you never know. 

6. Play imaginative games. 
Games such as cops and robbers or pretending to be a character from your favourite TV show or movie can be really inspirational. 

7. Rewrite a famous story. 
Sometimes creating new characters or a story plot from scratch can be difficult. To improve your creative writing skills you can take a well-known story, such as Cinderella or any other fairy tale and change it slightly, so it has a different ending or comes from a different character’s perspective. For example, you can write from the point of view of the ugly step sisters and how they felt when Cinderella found her Prince Charming! Or what if Prince Charming chose the step sisters over Cinderella, what would she have done to escape? 

8. Use image prompts to inspire you! 
Image prompts, such as photographs, paintings, or a picture in a magazine can be great. You can even take your own pictures when on a day out or on holiday. When you come home, for each picture you can write an interesting caption to describe it. You can even try creating a whole story from all your holiday photos! 

9. Incentivise your writing! 
When writing, try setting yourself some small goals. For example today I will aim to write 100 words. Once you achieve this goal, give yourself a reward. This can be anything you like, such as going out with your friends, watching
your favourite film or playing your favourite game. The important thing is that you stay motivated when writing. This is most important when trying to improve your creative writing skills. 

10. Connect writing with your interests. 
If you love football, why not write about your favourite footballer? How would you feel if you met them? What would you say to them? Why not write an imaginary letter to them? Whatever you enjoy doing, you can link any writing activity to it!

HOW TO DEVELOP CREATIVITY


Written By :
JOSAN RANJJITH CJ
YOUNGEST AUTHOR OF TAMIL NADU 2018
LOYOLA COLLEGE OF ARTS AND SCIENCE

Sunday, September 23, 2018

MEMORIES

Just an eight letter word to say
Pricks like a sword till today
Which is always a part of past
And fills our heart and mind with thirst
For those days which are already gone
Where we had once lived upon
Some of wreath some of garlands
Some were happy sad were some moments
The more we try to shrivel up
The more they try to gather up
Such were the moments so fine
Thinking of it makes us shine
Love was that and not lust
Oh dear ! Where all are they lost!
Song of which when my heart hears
All that remains is my eyes full of tears


Knows not anybody the way I crave
All those memoirs till today I save
Not for a moment will it ever perish
Like a flower blossoming
Will my memories always
cherish!!


Written By 
Chitrotpala Chaitali Dash 
From Odisha

Memories

A TOUGH CHOICE

SELF-RESPECT
He was a seventeen year old guy then. They called him Suraj. He was the son of a retired school teacher. The name suited him well as he was born on an auspicious Sunday.
Suraj was invited by one of his friends for a family wedding. Suraj, along with his friends planned to attend the wedding together. And it was decided that each one would carry ten rupees with him as the wedding gift.
Suraj hurried home and asked his mother, “Ma, I have to attend a wedding tonight. My friend has insisted me to come anyhow. My friends have decided that we all should gift ten rupees to the couple. Can you give me fast?”
His mother was a humble and caring lady. Despite the poor conditions, she didn’t deny to this request. She searched every purse and every box she possessed. She searched every corner of the house. And finally she turned up to her son and said,”My child, I managed to get only five rupees. And this was the last piece of my savings. Take this and I am sure your friend will understand us.“
Suraj felt dejected. How excited he was to attend the wedding, and enjoy with his friends! But he assured his mother that he would surely attend the wedding. But then he thought it would not be right to give only half the amount that was decided and have fun for free. So he made a tough choice. As promised, he attended the wedding and gifted the money he had brought with him. And he went away without even touching a single grain of rice.

COMPASSION
Years passed and Suraj turned into a kind young man. He was married now and had a beautiful and loving wife. Every Saturday, he visited the temple. One day he came across an old man who walked the streets begging door to door. Suraj felt pity on him and bought him some sweets. And this became his weekly errand. He bought two pieces of sweet and handed it over to the old man who was usually seen lying on the verandah of one of the shops. The old man could not see, but he had seen the most beautiful heart in his mind’s eye and had blessed him.
In a wintry day, Suraj had once gone to visit the old man. But he found him shivering in the harsh winter. He bought him a warm blanket, wrapped it around him and said, “ Baba, take this as a gift. And take your share of sweets for today.” And that day too, the old man thanked him and blessed him with almost tears in his eyes.

A SAVIOUR
Suraj had once visited a village and encountered a little boy who did odd jobs to make his ends meet. He took the little boy with him, and enrolled his name in a school on the outskirts of the town. He took care of all the expenses of the boy required for his education.
One day, Suraj was at home when one of her daughter’s friend, Anita had come to meet her. She stayed in their house the whole day and the children had a lot of fun. In the evening, Suraj got an emergency call. He got ready to go. While going, he asked Anita whether he would drop her on his way. Both the friends hesitated as they didn’t want their fun to stop halfway.
Suraj immediately reached the school where the little boy was living. They said that the boy’s condition had become too worse and he needed immediate medical aid. Suraj, without any second thought, took him to the hospital as hastily as he could.
The boy was admitted immediately. After the check-up, the doctor came to Suraj and said,”This boy would have died today if you had neglected a minute more. You brought him at the right time. He is fine now. You can take him tomorrow with you.”
And that fine day, Suraj saved a person from death.
Everything happens for a cause. If Suraj had dropped Anita home that day, then it would have been too late.

This is just an anecdote of a simple man who always stands for what is right. He is an epitome of righteousness. God knows how many lives he might have saved and how many people he might have inspired. He may not be a hero that we see in movies, but he is a savior – a real hero.
And I feel proud to be the daughter of such a person.
Thanks papa, for just e.v.e.r.y.t.h.i.n.g.

Written By 
Chitrotpala Chaitali Dash
From Odisha

A Tough Choice

ON THE WAY TO TRUTH

Ripped by emotions and slaughtered by desires, she was walking across her deadly past. It was the hour of dead. The path was full of dark vibes. Illusions swore to gobble her up and vengeance had almost shrugged her from every corner. Coveted with blood stains, the road still held the corpse of falsehood laying over it. She was invited by betrayals with every step she took. These pitfalls never left her path. She had to combat it in any way. As she was walking forth, the treadmill of temptations were consistently pulling her from behind. She was walking alone, lonely and forsaken, with not a single creature beside her. 

This lonely deserted road, embellished with mirages everywhere, had hardly any void left for truth to sneak in. All that the road could behold was loneliness and all that her eyes could see was darkness. She walked on and on like a homeless wanderer groping for that single ray of light that would accept her and purify every ounce of her soul once again. All she wanted was to leave her haunting past behind and move ahead to the Present where her body resided. She had to free her soul from the massacres of past and from all those menacing devils. The curse of her ruthless love was still there, walking in the form of her own shadow. The apparition of vices still loomed over the castles of her heart fastening its every beat into a noiseless thunder. 

And if you try to search for her, you will still see her walking aimlessly on that massacred road, wandering in search of Truth. If only she found her way ! The nature of war is to fight, but on the way to peace, the nature of war is to surrender. But this barren path is the dark hour that we encounter just before the breaking of dawn. So is the anomaly of war that has to be fought for attaining peace. The war for virtue has to be fought with the vices. The demons of jealousy, anger, falsehood, betrayal and selfishness have to be crumpled to achieve the Truth – the divine ray of light. If thou opt for the path of truth, He will shelter thou in His divine abode.

Written By 
Chitrotpala Chaitali Dash
From Odisha

On The Way To The Truth

FIRE IN HER EYES

When she looked, so long, at the fire
The charisma in her eyes spake
of a subtle, sparkling desire
The tear trickling down her cheeks
was but, a blood bathed with ire
Her mystical raven eyes
had hidden a rose-colored flame
That, had once, assured of summer hues
Until the utopia stoned, they hung lifeless
And the cloud poured, a wildfire in her eyes
Her heart akin to a campfire
Had ignited the folks with hope
Illicited by treason, frozen by satire
The fire smirked as she bat an eyelid
And Time smouldered to ashes of fire
.
.
.
.
.
.

Written By :-

Chitrotpala Chaitali Dash
From Odisha

Fire In Her Eyes



Saturday, September 22, 2018

शीशे से इश्क़ पे निशान लिए बैठे

शीशे से इश्क़ पे निशान लिए बैठे 
अपने दिल में तेरी पहचान लिए बैठे 

सहरा की ज़मी पर नमी के लिए 
अश्कों से भरा आसमान लिए बैठे 

कुछ टूटा कुछ अधूरा ही सही 
खुद को तड़पाने का सामान लिए बैठे 

दिल रेज़ा रेज़ा,रिसता दर्द फिर भी 
दिल में इश्क़ का अरमान लिए बैठे 

दिल की दीवारों-दरारें जोड़ना तो चाहा 
पर ज़ख़्मों के निशान लिए बैठे 

ना बिकेगी ये बाज़ारी मुहब्बत तेरी
हथेली पर हम मौत का सामान लिए बैठे

दिल के ज़ख़्मों से झांकती है उदासी
लबों पे झूठी मुस्कान लिए बैठे

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आज हर रिश्ता ज़रूरत पर टिका है.. 
या यूं कह लीजिए कि जिम्मेदारियों के नाम पर बली चढ़ा है...... 
ज़रूरत ख़त्म रिश्ता ख़त्म.. 
जैसे.. 
ना जाने वक़्त कब और कितनी करवटें बदलता है
हर करवट एक नया अनुभव कराती है,कभी प्रेम,कभी वादे,कभी अपने,कभी जुदाई,कभी बेवफ़ाई दे जाता है,खुशियां तो दो पल की आनी जानी है,तन्हाईयां तो पल पल में बस जाती है,
एक दरख़्त का बीज जब अंकुर होता है,उसके आने से चेहरों में चमक आ जाती है,हर कोई पानी से सींचना चाहता है,पल पल ख़्याल रखना चाहता है 
आज नही कल ये अंकुर बड़ा होगा फल,फूल,छाया देगा,वक़्त भी अपनी गति से बढ़ता जाता है,एक दिन,वो दिन भी आ जाता है,
हर डाली में फूल खिल जाता है अपने प्रेम की पवन से हर पल दरख़्त फल बरसाता हैं,जब थक जाए गर कोई तो उसकी छाया में राहत पाता है 
कितनी चिड़ियों का रैन बसेरा कहलाती है आज फिर वक़्त ने करवट ली और पतझड़ आया,सब तन्हा छोड़ आए,यूं तो फल फूल न दे पाता पर..
किसी का ईंधन बन जाता,हर दिन एक एक अंग किसी के चूल्हे की अग्नि में झुक जाता,माना बूढ़ा हो गया हूँ पर आज तेरे लिए रोटी बनाऊंगा.
पर एक दिन वो भी ख़त्म हो जाता,हर अंग कटते कटते ठूठ रह जाता.. 
जो कभी किसी को न भाता..हां कभी थक कर कोई राहगीर पल भर के लिए बैठ जाता टूटा सांसों को और तोड़ जाता या फिर कभी ठोकर बन दो बातें और सुन लेता.
क्या ये वो ही अंकुर है जिसमें हर कोई पानी दे जाता था प्रेम से सहलाता था 


Priya Batra
Priya Batra
 
Priya Batra
(Nagpur)

Sunday, September 9, 2018

उसको पता था ..

उसको पता था मुझको, किताबें पढ़ना पसंद हैं
वो मेरी ज़िन्दगी में किताब बनकर आई
मैं उसको पढ़ता गया जैसे उसमे खोता गया
मैं उसके एक एक अक्षर, एक एक शब्द को पढ़ता गया |

उसके शब्दों के जाल में फंसता गया
जिस दिन उसको न देखता था छूकर
लगता था ऐसा ख़ुद से जुदा हो गया हूँ रूठकर
उसको भी रहता था मेरा इन्तजार
कब आयेगा मेरा पढ़ने वाला
कब मैं उसका करूँगी दीदार |

उसको रोज़ाना पढ़ना मेरी कमजोरी बन गयी
न पढूं तो मौत पढ़ने के बाद जैसे ज़िन्दगी मिल गयी
उस किताब की तस्वीर मेरी आँखों में
और बातें दिल में ठहर गयी
पूरा पढ़ने के बाद उसको मेर ज़िन्दगी बदल गयी |

एक दिन उसे दुनिया की नजरों से चुराना चाह
हमेशा के लिए उसे अपनाना चाह
उसने मुझे तो बदल दिया लेकिन ख़ुद
मुझे छोड़कर खिन दूर चली गयी
अब दिल से न पढूंगा कभी ऐसी किताब को
मेरे लिए ये किताब एक सबक बन गयी |


उसको पता था ..
उसको पता था ..


Saturday, September 8, 2018

जब से हुई हूँ सोलह की..........

जब से हुई हूँ सोलह की ये क़ुदरत सताने लगी है
कभी मेरी जुल्फों को कभी मेरी ख़ुशबू उड़ाने लगी है
मेरी ख़ुशबू को उड़कर ले गयी थी चमन में
छोड़ दिया चमन तितलियों ने मुझ पर मडराने लगी है |
जब से हुई हूँ सोलह की..........

सूरज की किरने कभी मेरे गालों को
कभी इस बदन को छूने लगी हैं
लगता है मुझको सूरज की नियत बहकने लगी है
रात की चाँदनी मुझको जगाने लगी है
कभी मेरे होठों की लाली तो
कभी मेरी रंगत चुराने लगी है |
जब से हुई हूँ सोलह की..........

सितारे भी टिम-टिमाकर मुझको चिढ़ाने लगे हैं
रूठ जाऊं गर मैं तो टूटकर मनाने लगे हैं
रूठ कर न करो इन पर सितम
ये अँधेरी रात मुझसे कहने लगी है
जब से हुई हूँ सोलह की..........

ख़ुद को छुपाऊँ दुपट्टे में कैसे
बैरिन हवा दुपट्टे को उड़ाने लगी है
खिसका जो दुपट्टा मेरा बारिश की बूंदें
मुझमें समाने लगीं हैं |
जब से हुई हूँ सोलह की..........


जब से हुई हूँ सोलह की..........
जब से हुई हूँ सोलह की..........

Friday, September 7, 2018

अक्सर तुम्हे पुकारा करता हूँ


अक्सर तुम्हे पुकारा करता हूँ
इस तरह से दिन गुजारा करता हूँ ।

 जब भी नींद रात में आती नहीं
अश्कों से तकिया भिगोया करता हूँ ।

 तुम मुझे चाहती कहाँ कतरा भी
फिर क्यों तुम्हीं पर हक जताया करता हूँ ।

 हाँ लौटोगी तुम इक रोज इसी की आस में
उम्मीदों का दिया जलाया करता हूँ ।

 हमदर्द, हमराही बनों “गौरव” के तुम,
बस इस दुआ में हाथ उठाया करता हूँ ।
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 गौरव हिन्दुस्तानी

अक्सर तुम्हे पुकारा करता हूँ
अक्सर तुम्हे पुकारा करता हूँ



Wednesday, September 5, 2018

उमंग की विषम रात

श्यामा देवी धीमें कदमों से अपने सबसे लाड़ले और छोटे बेटे के कमरे की ओर आते हुए ऊँचे स्वर में कहतीं हैंउठ बेटाउठ जा देख तेरे दोनों भाई ऑफिस चले गयेसाढ़े आठ बजने वाले हैंसूरज भी कितना ऊपर चढ़ आया हैऔर कितना सोयेगा,उमंग बेटा उठ जा माँ की आवाज सुनकर हम्म ..हाँ..करके उमंग फिर नींद की चादर ओढ़ लेता है |श्यामा देवी बेटे के सिराने आकर बैठ जाती हैं और अपने कन्हैया की नींद तोड़ने का सुख लेती हैं |
उमंग के सिर पर हाथ फेरते हुए  उठ बेटा वरना दीप्ति बहू आती होगी तुझे तो वही जगा पाती है | प्रतिदिन उमंग के कमल रुपी नयन तो माँ के आँचल में ही खिलते हैं | अरे मम्मी छोटी भाभी को क्यों भेजती हो वो ..वो तो बिना कुछ बोले-कहे अपना ब्रह्मास्त्र चला देती हैंजब भी जगाने आती हैंगिलास में  पानी लायेंगी और पूरा उड़ेल देती हैं मुझ परन चाहते हुए भी ये सोने का बिस्तर छोड़ना ही पड़ता है | बड़ी भाभी अच्छी हैं वो सिर्फ़ दो चार आवाजे देती हैं और चली जाती हैंलेकिन आज बड़ी भाभी मुझे जगाने नहीं आयीं ? श्यामा देवी  हाँ.. शिखा कुछ काम में लग गयी होगी |
मम्मी जी ये क्या आज तो तुम्हारे लल्ला पहले ही जाग गये और मेरा ब्रह्मास्त्र तो बेकार ही चला जायेगा दीप्ति ने कमरे में प्रवेश कर चुटकी लेते हुए कहा | ये इतना नौटंकीबाज हो गया हैइतनी देर से जगा रही हूँ पर उठता ही नहीं तू अपना अस्त्र चला ही दे बहू श्यामा देवी ने विनोद भाव से कहा | दीप्ति अपनी सासू माँ के पास बैठकर उमंग से कहती है  देवर जी सुबह जल्दी उठना सीखो और मंदिर जाया करो | जब मम्मी जी तुम्हें जगाने आतीं हैं तब तक पापा जी हम सबको दो-चार सुना चुके होते हैं | आज शिखा दीदी से कह रहे थे कि तुम तीनों के लाड़-प्यार ने आदतें बिगाड़ दी हैं |
उमंग अंगड़ाईयाँ लेते हुए  मेरी प्यारी नटखट भाभी ये कोई पहली बार थोड़ी कहा हैपापा तो हर रोज कहते हैं क्या करूँ सुबह जल्दी उठकर ? कौन सा मुझे कॉलेज जाना है या फिर ऑफिस ग्रेजुएशन किये हुए एक साल हो गया मुझे, अगर काम करने का जिक्र भी करता हूँ तो आप सब नाराज हो जाते हैंऔर बात रही मंदिर जाने की  हर सुबह मम्मीबड़ी भाभी और तुम्हारे दर्शन ही सभी देवियों के दर्शन हैं मेरे लिएस्वदीप भैया तो साक्षात् राम हैं और दीपक भैया लक्ष्मण | जब सारे देव और देवियाँ घर में ही वास करते हैं तो मैं कस्तूरी मृग बन बाहर क्यूँ भटकूँ |
हाँ जानती हूँ तुमसे बातों में कौन जीतेगा देवर जी, अब बिस्तर का त्याग करो और नाश्ता करलो | उमंग बिस्तर छोड़ देता है माँ और भाभी के साथ दैनिक कार्य में व्यस्त हो जाता है |
     इस प्रकार से उमंग की हर सुबह की शुरुआत अपनी माँ और भाभियों के दर्शन से होती है इस मनोहर दृश्य को देखने के लिए सूर्य देवता भी अपने उज्ज्वल नेत्रों को उमंग की खिड़की पर प्रतिदिन रख दिया करते हैंऔर रखे भी क्यों न ! वर्ण में राम और चंचलता में कृष्ण है उमंग | श्यामा देवी की आँखों की रौशनीभाईयों,और भाभियों के लिए खिलौना और पिता सत्यप्रकाश के चेहरे की रौनक है उमंग कर्म से अध्यापक रह चुके सत्यप्रकाश स्वभाव से विनयशील हैं श्यामा देवी की ममता और सत्यप्रकाश के  संस्कारों ने पूरे परिवार को एकता की अटूट गांठ से बांध रखा है | स्वर्ग है स्वर्ग है ..सत्यप्रकाश जी आपने अपने घर को साक्षात् स्वर्ग बनाया हैउठने बैठने वालों से प्रायऐसे शब्द सुनने को मिल जाते हैं इस मशीनी युग में भी संस्कृति और रीतिरिवाजों की गांठ ढ़ीली नही होने दी है | पड़ोसियों के लिए किसी कहानी के पात्र जैसे ही हैं इस घर के सदस्य | उमंग के स्वभाव से पूरा मोहल्ला परिचित है जब बोलता है तो ख़ुशियों के फूल खिलते हैंइक्कीस वर्ष का होकर भी जब बच्चों में मिल जाये तो ख़ुद को भूल ही जाता है | उसकी हंसी  ठिठोली करुण रस के होठों पर भी खिलखिलाहठ उत्पन्न कर दे | समय का चक्र दिन-मास को हर्ष विनोद से अपने साथ धीमी गति से लिए जा रहा था |
     प्रकाश को अंधेरे में बंदकर निशा को कर्तव्यों की चाबी देकर सूर्य देवता अपने शयन गृह पश्चिम दिशा में प्रवेश कर चुके हैं सभी को सुख देने वाला पक्षियों का कोलाहल भी शान्त हो चुका है दीपक ऑफिस से घर लौट आया है लेकिन उमंग और स्वदीप अभी तक घर नहीं लौटे हैं श्यामा देवी को चिंता हो रही है |
श्यामा देवी  आज अभी तक स्वदीप नहीं आया है और ये उमंग भी न जाने कहाँ निकल गयादोपहर से ही गायब है | इस लड़के को भूख प्यास की तो चिंता ही नहीं है  
शिखा  मम्मी जी आते ही होंगे कभी-कभी काम ज्यादा हो जाता है न ऑफिस में...लेकिन देवर जी पता नही कहाँ रह गये ?
सत्यप्रकाशबैठा होगा किसी के यहाँआजायेगा थोड़ी बहुत देर में स्वदीप की मम्मी अब उमंग को भी विवाह के अटूट बंधन से बांध दो तब न जाया करेगा इधर  उधर |
घर की दोनों बहुओं शिखा और दीप्ति ने भी ससुर जी की बात पर हामी भरते हुए श्यामा देवी से कहा  हाँ मम्मी जी  अपने कन्हैया के लिए एक राधा ले आओ |
श्यामा देवी दीपक से  जा बेटा उमंग को देख तो आ ..
ठीक है कहकर उमंग को ढूढने निकल जाता है दीपक
दीपक भी न जाने कहाँ रह गया पंद्रह-बीस मिनट हो गये अभी तक न लौटा  श्यामा देवी ने  घड़ी की ओर देखते हुए कहा |
शिखा और दीप्ति भी चिन्तित हैं  न जाने दोनों लोग कहाँ रह गये ?
इतनी देर कभी नहीं हुई स्वदीप और उमंग को  मन ही मन सत्यप्रकाश सोच रहे हैं |
घड़ी की चाल के साथ चिन्ताओं की रेखायें भी हर प्राणी के माथे पर बढ़ती जा रहीं थीं कभी घड़ीकभी दरवाजे को देखलेते हैं चारो लोग | जैसे चातक हर आने-जाने वाले काले-सफ़ेद बादलों को देख कर पानी की आस करता है वैसे ही घर के चारो सदस्य दरवाजे से गुजरने वाले व्यक्तियों में अपने तीनों की आहट सुनने को आतुर हैं | परिवार की इस कठिन परिस्तिथि में घड़ी ने 9:15 मिनट बजाकर सरल कोण बना दिया है |
     दरवाजे पर आहट सुनायी दीदीपक हारे मन से ख़ाली हाथ लौट आता हैपापा पूरे मोहल्ले में कहीं नही मिला उमंग जहाँ  जहाँ वो बैठता है सब जगह देख लिया कहीं नही है |
आँखों में बंधा सब्र का बांध आँसुओं ने तोड़ दिया है श्यामा देवी विलाप करने लगती हैं कैसा होगा मेरा उमंग..कहाँ गया मेरा बच्चा .. शिखा और दीप्ति सासू माँ को सँभालती है ...दोनों की आँखों में आँसू छलक आते हैं मम्मी जी रोइए मत ..आ जायेगा हमारा उमंग |
सत्यप्रकाश का मन भी व्याकुल हो उठा है दीपक तू अपने भैया के ऑफिस फ़ोन लगाकर पता कर कहाँ रह गयावो क्यों नही आया अभी तक ..|
दीपक फ़ोन करने ही जा रहा था कि स्वदीप का फ़ोन आता है,
दीपक  भैया तुम कहाँ हो ? और उमंग भी अभी तक घर नहीं आया है मम्मी का रो रोकर बुरा हाल है
स्वदीप का स्वर रुंधा हुआ है आवाज भी ठीक से नहीं निकल रही है
स्वदीपदीपक तुम सब लोगों को लेकर सेवा सदन अस्पताल में आजाओं ..उमंग...उमंग मेरे साथ ही है |
भैया की बात सुनकर दीपक सन्न रह जाता है और कुछ पूछ पाता, फ़ोन कट जाता है | आनन्  फानन में दीपक सबको लेकर अस्पताल पहुँचता है अस्पताल पहुंचकर रिसेप्शन से पता चलता है कि उमंग बर्न वार्ड में भर्ती है चारो लोग बर्न वार्ड में पहुंचते हैं जहाँ उमंग भर्ती है | मानों लक्ष्मण के आज शक्ति लग गयी है और राम को विलाप के सिवा कुछ और नहीं सूझ रहा है स्वदीप के चेहरे पर बार बार आते आंसू यही कह रहे थे |
श्यामा देवी की सिसकियाँ तब चीखों में बदल जाती हैं जब अपने कलेजे के टुकड़े को अस्पताल के बैड पर देखती हैं शिखा और दीप्ति भी मूरत हो जाती है अपने लाड़ले उमंग को देखकर | हे ईश्वर ये क्या हो गया |उनके मुँह से यही निकलता है |

उमंग की विषम रात



दोपहर में मुझे उमंग का फ़ोन आया कि भैया मैं सेवा सदन अस्पताल में भर्ती हूँ | और फिर किसी लड़की से बात हुई उसने सारी बात बताई मैं तुरंत यहाँ पहुंचा  उस समय भी कहाँ बोल रहा था उमंग  | डॉक्टर ने बताया12-16 घंटे लगेंगे होश आने में | मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गयी थी |  आधा चेहरा बुरी तरह झुलस गया है और दोनों हाथों पर भी फफ़ोले पड़ गये हैं  स्वदीप ने अपने आँसू पोंछते हुए बताया |
वो लड़की और उसके माँ बाप भी उपस्थित है बेहद दुखी है | लड़की की आँखों से भी आँसू किसी झरने की तरह झरते जा रहे हैं |
स्वदीप बेटा ये सब हुआ कैसे सत्यप्रकाश ने रुंधे हुए स्वर में पूछा
हमारा उमंग तो मन मौजी है आज बाजार की तरफ घूमने निकल आया होगा | ये लड़की बताती है कि कई दिनों से एक लड़का इसके पीछे पड़ा हुआ था इसने विरोध किया तो आज इसके ऊपर तेजाब डालने के लिए इसके पीछे पीछे भाग रहा था लेकिन तब तक उमंग ने देख लिया और इसे बचाने के चक्कर में हमारा उमंग इसके आगे आगया  और उसका आधा चेहरा जल गया | इस बार आँखों में उतरते आँसुओं के सैलाब को रोक नहीं पाया था स्वदीप, फर्श पर मोती जैसे गिर रहे हैं उसके आंसू |
श्यामा देवी ख़ुद को धीर नही बंधा पा रही हैं | मेरे पूर्णिमा जैसे चंद्रमा को ग्रहण लग गया  शिखा  बहू, ये ईश्वर भी कितना निर्दयी है मेरे बच्चे को कैसे घाव दिये हैं जरा भी दया नहीं आयी उसे | उस लड़के का सर्वनाश हो जाये  श्यामा देवी की रुवासी में अब गालियां और कोसना भी शामिल हो गया है  कभी शिखा के कंधे पर सिर रखकर रोती हैं और कभी दीप्ति के दोनों के कंधे माँ के आँसुओं से भीग चुके हैं कैसे समझाये माँ को,वो दोनों तो ख़ुद को नहीं समझा पा रहीं हैं शिखा और दीप्ति ने  अपने बच्चे की तरह प्रेम किया है उमंग को ,कभी ख़ुद को महसूस नही होने दिया कि वे निसंतान हैं |
सत्यप्रकाश और दीपक की आँखे भी कभी आँसुओं को पीलेती और कभी छोड़ देती उन्हें लुड़कने के लिए |
एक दूसरे को सांत्वना देने का उद्योग करते हैं पर किसी की आंखे बहना नहीं मानती हैं |
ये काली रात बीत जाती है इस परिवार के आँसुओं में | सूरज निकल आया है पर लगता है उमंग की खिड़की से उदास लौटकर आया है , आज इसके प्रकाश में तेज नही है | मोहल्ले वालों को जब उमंग के बारे में पता चला तो दौड़े चले आये हैं उसे देखने के लिए, अस्पताल में भीड़ लग गयी हैउमंग के चाहने वालों की |
श्यामा देवी का गला बैठ गया है रो रोकर बैठे हुए स्वर में उमंग उठ जा बेटे ऑंखें खोल ...
दीप्ति जा तू अपना ब्रह्मास्त्र ले आये सुबह को ऐसे नहीं उठता है श्यामा देवी के होठ कंप कंपाने लगते हैं स्वरों के साथ | मम्मी जी ...दीप्ति ये कहकर रोने लगती है  
दीपक के हृदय में उस लड़की और उसके परिवार के लिए नफरत ने जन्म ले लिया हैइसकी वजह से मेरे भाई की ये दशा हुईहम सब की सुबह इस खिले फूल से चेहरे को देखकर होती थी पर कैसे मुरझा गया है मेरे भाई का चेहरासब इसी लड़की की बजह से ....मन ही मन कह रहा है दीपक
उमंग को शायद उस जलन की इतनी पीड़ा न हो रही होगी जितनी पीड़ा इस पश्चाताप की आग में जलने से हो रही है लड़की एक कोने में गुनहगार सी खड़ी ख़ुद से कह रही है
अचानक से कमरे में मम्मी शब्द की चीख गूंज जाती है अब जलन का अहसास होने लगा है उमंग को होश आने लगता है | कमरे में उपस्थित सब लोग सिहर जाते हैं और श्यामा देवी के रोंगटे खड़े हो जाते हैं | हाँ उमंग...मेरा बेटा मैं तेरे पास ही हूँ | उमंग आँखे खोल लेता हैमाँ, भाभियोंभाईयों और पिता की सूखी आँखे देखकर ख़ामोश हो जाता है | पीड़ा की चीखों को अपने अन्दर दफ़न कर लेता है | उसकी आँखों में आँसूं आजाते हैं |
पर श्यामा देवी जानती हैं जले का दर्द, पडोस के कमरे से एक दूसरे मरीज की पूरी रात चीखे कम नहीं हुई थीवो जानती हैं कि उन्हें देखकर उमंग ने अपनी पीड़ा को हृदय में समाहित कर लिया है |
उमंग बेटा तुझे जलन हो रही होगी | रो मत , दीपक मेरे बच्चे को कुछ दवाई ले आ .... श्यामा देवी ने  अपने आंचल से उमंग के आँसू पोछते हुए कहा |
उमंग  नहीं मम्मीये आँसू जलन के नही ..ये तो इसके बात के हैंकि पहली बार मेरी बजह से तुम सबकी ऑंखें नम हैं | ये बात सुनकर हास्य रस की आँखे भी आँसुओं में भीग कर तर हो गयी हैं |
उमंग मम्मी वो लड़की तो ठीक है न ?
श्यामा देवी ने उस लड़की को तो देखा भी नहीं था बेटे की पीड़ा में उन्हें तो ये भी नहीं पता है कि वो लड़की पूरी रात यहीं थी |
हाँ वो बिल्कुल ठीक है  स्वदीप ने आगे आकर कहा
वो मरे जिये हमें क्या ? सब उसी का किया धरा है ? उसी की वजह से ये हालत हो गयी तेरी और तू उसकी सलामती पूछ रहा है  श्यामा देवी ने गुस्से में कहा |
उमंग  मम्मी गुस्सा क्यों करती हो उसका दोष नही है | दोष तो उस लड़के का है...मम्मी जरा सोचो अगर मेरी बहिन होती उसकी जगह तो क्या मैं उसको इस तेजाब की जलन में झोंक देता नहीं न ..बस इसे भी मैंने बहिन मानकर ही बचाया है | कम से कम किसी के काम तो आया मम्मी मैं तो ये सोचता हूँ काश उस लड़के के माता पिता भी तुम्हारे जैसे होते तो शायद वो ये न करता | जिन संस्कारों से तुम दोनों ने हम तीनों भाईयों को सींचा है अगर वैसे ही हर माँ  बाप अपने बेटों को सींचे तो किसी बहिन का चेहरा झुलसेगा नहीं, किसी बेटी की इज्जत तार  तार नहीं होगी  
लड़की और उसके माता पिता ख़ामोशी से उमंग की बाते सुन रहे थेइस हाल में भी कितनी अच्छी बाते कर रहा है लड़की और उसके माता पिता हाथ जोड़ कर श्यामा देवी के आगे खड़े हो जाते हैं, कुछ कहने के लिए उनके पास शब्द नहीं हैं पर आँखे अभी भी निरंतर रिस रहीं हैं लड़की को देखकर श्यामा देवी उससे उसका नाम पूछती हैं | वंदना प्रति उत्तर में लड़की ने कहा श्यामा देवी के इस प्रश्न से साफ़ होजाता है कि उन्होंने उसे और उसके परिवार को माफ़ कर दिया है |
 स्वदीप डॉक्टर को बुला लाता है और फिर उमंग को मलहम पट्टी की जाती है | उमंग पंद्रह दिनों तक अस्पताल में ही भर्ती रहता है धीरे  धीरे घाव भरने लगते हैं बीच  बीच में वंदना भी उसे देखने आ जाया करती है अब वो बहिन बन गयी है उमंग की | उमंग अब घर लौट आया है जख्म भर चुके हैं लेकिन जले के निशान कहाँ जाते हैं दिन बढ़ते गये और मलहम पट्टी कम होते गये इस प्रकार  कई महीने बीत गये | घर में फिर वही ख़ुशी की उमंग दिखने लगी है |
सत्यप्रकाश और श्यामा देवी को बेटे के चेहरे पर दाग लगने का मलाल तो है लेकिन एक बेदाग बेटी मिलने की दोगुनी ख़ुशी भी है इस बार राखी के त्यौहार पर वंदना ने उमंग के साथ  साथ स्वदीप और दीपक के भी राखी बांधी है |
इस घटना के एक साल गुजर जाने के बाद दीप्ति के पिता अपनी छोटी बेटी का रिश्ता उमंग के लिए लाते हैं,और उमंग का विवाह हो जाता है अब उमंग भी अपने बड़े भैया के साथ ऑफिस जाता है |
श्यामा देवी के हृदय में बेटे की शादी को लेकर चिंता भी अब समाप्त हो चुकी थी | सत्यप्रकाश पहले की तरह ही अब अख़बार को दिन में चार  पांच बार पढ़ कर समय व्यतीत करते हैं लेकिन उमंग की उस विषम रात को कभी भुला नहीं पायेगा ये परिवार |