Thursday, May 14, 2020

मदर्स डे | Mother's Day

दिखावा इतना बढ़ चुका है, कि कभी कभी आँख सच को मिथ्या मानने पर मजबूर हो जाती है। इंसान सच्चाई से ज्यादा दिखावे के पीछे लाभान्वित होता जा रहा है, इंसान के मन में सिर्फ प्रेम ही एक ऐसी वक्तव्य है जिसे वह सदैव सहेज कर रखे रहना चाहता है परंतु इस आडम्बर की दुनिया में वह भी इस मिथ्या से अछूता नहीं रह पाता है, यह आडम्बर चीख - चीख कर कहता है कि आओ मुझे अपने व्यक्तित्व में समेट लो.।
लोगो के मन में भावन्वित रूप ले चुका गोरो की एक अनायासी विधा जो महज एक सयोंग के रूप में उभरा और दुनिया को इस धरा के सबसे पावन प्रेम में ग्रसित कर लिया।
माताओ के प्रति अनोखे प्रेम को मात्र एक दिन में समेट कर वर्ष की 364 दिन उन्हें महिमामन्डित होने के लिए छोड़ देना कहा तक तर्क संगत है। हां उन्हें उनकी महत्वा समझाने के लिए कि उनके लिए हमारे ह्रदय में अथाह प्रेम है और हम उन्हें अपने जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान की स्वामिनी मानते हैं, इस आधार पर इस एक दिन को शुभकामनाओ से भर देना हर सिद्धांत पर उत्तम है।।
मुझे पता था कि आज "मदर्स डे" है, बहुत खुश था क्योंकि आज मेरी माता जी का जन्मदिन था ,,हां मैँ इसे उनके जन्मदिन के रूप में ही मनाता था। जीवन के इस नाव के सारे खिवइयो को सँभालते एवम दिशा देते हुए उन्हें स्वयं का कुछ ख्याल ही नहीं रहा , हां उन्हें नहीं पता की उनका जन्म किस दिन हुआ था। मुझे यह एक अत्यंत ख़ुशी का दिन लगता जिसमें माता जी के ख़ुशी रहने का पूर्ण विश्वास रहता था। 
ख़ुशी एवम् शोहार्द का वातावरण मेरे मन में समाप्त  सा हो गया , मेरे मन में जो आज के दिन को लेकर छवि थी वह धूमिल सी दिखाई दे रही थी । मैंने कल्पना नहीं की थी कि आडम्बर का मर्म इस पवित्र नाते को भी लोगो के मन में  मात्र दिखावे तक सीमित संजो कर रखेगी। जिसे पवित्र एवम सगुण मान रहा था वह लोगो के ह्रदय में मात्र सांत्वना प्राप्त करने का एक जरिया था कि वे अपने माता से अत्याधिक प्रेम करते है।
जिसे दुनिया के सामने मातृछवि के साथ प्रस्तुत किया गया जिसपर लिखा था...love you maa.

mothers-day



कवि - शिवम् तिवारीshivam tiwari kavi
शहर - प्रयागराज
ईमेल - shivam9532096168@gmail.com

Sunday, March 15, 2020

पथ पर चलने को आतुर हूँ

पथ पर चलने को आतुर हूँ,
मन मे उठती यू आभा से, उत्पन्न घटित हर बाधा से,,,
यू तनिक नही घबराता हूँ, चलने बहने की नगरी मे उत्प्लव का शोर मचाता हूँ!
फिर भी नभ की हर बून्दो मे अन्त: के राग मे प्राचुर हूँ
पथ पर चलने को आतुर हूँ,
पथ पर चलने को आतुर हूँ,

वह शक्ति तुम्हारी जीवन की है ह्र्दय राग् मे लीन् प्रिये, मोती, सीपो कि क्या बिसात हम कंकड तक है बीन लिये,
किस आन्धी मे दिखलाऊ मै, कितने और राग् सुनाऊ मै!
लिख लिख कागज मे अब ऊब चुका , बस नभ मे लिखने को
प्राचुर हूँ,
पथ पर चलने को आतुर हूँ,
पथ पर चलने को आतुर हूँ,


path par chalne ko atur hun


कवि - शिवम् तिवारीshivam tiwari kavi
शहर - प्रयागराज
ईमेल - shivam9532096168@gmail.com

अब प्रेम न हो जीवन मे

स्वतंत्र रूप मन का प्रवाह करता है शोर किनारे,
प्रेम बना है अमर आज सहता था घोर किनारे,
कभी न टूटेे धागे मे आ गिर आयी चिङारी ,,,,
प्रबल पीर अनुभव मे आ फिर छाई अन्धियारी !!

गहरे मन की शोभा ने छीना फिर अधिकार हमारा,
चन्दन बन शीतल हो आया ह्र्दय पुकार हमारा,
कभी थी खाई सी गहराई कभी पाट आ छाया,
धीरज धूर्त ने उठा लिया मन का प्रकाश फिर सारा !!

अतुल् प्रेम का भ्रमण था मेरा , कहाँ पता क्या होगा,,
जिसकी दुनिया तुल्य बनी थी , कहाँ छितिज फिर होगा,,
दो पट रेखा साथ चली थी , दूरी स्वंय बनी थी,,
जिसका कल्पित नही हुआ फिर मिलन कहाँ से होगा !!

वेदना मेरी टपक रही है, कि फिर जीवन हो आए,,
लेकिन मन पर ठोस लगाया नही वो आगे जाए,,
जिसने छोड़ दिया है साथी हाथ अधूरे वन मे,
ईश्वर मेरी विनती सुनना, अब प्रेम न हो जीवन मे,
अब प्रेम न हो जीवन मे....!!!

ab prem na ho jeevan me


कवि - शिवम् तिवारीshivam tiwari kavi
शहर - प्रयागराज
ईमेल - shivam9532096168@gmail.com

Sunday, January 19, 2020

एकलव्य की कहानी | गुरुद्रोणाचार्य सही या गलत ? | Ekalavya story

भगवान् श्री कृष्ण के परम भक्तों, देशभक्तों तथा भारत की संस्कृति को संजोने वाले प्रिय युवाओं, आप सभी ने एकलव्य और गुरु द्रोणाचार्य की कहानी ( हाँ , वही कहानी जिसमें गुरूजी अपने शिष्य एकलव्य से गुरुदक्षिणा में अंगूठा मांग लेते हैं  ) अवश्य सुनी होगी | परन्तु इस कहानी को पढ़ने के बाद हमेशा हमारे दिमाग में प्रश्नों का भँवर उठ जाता है |  आखिर गुरु द्रोणाचार्य ने क्यों किया ऐसा ? जबकि एकलव्य ने धनुर विद्या उनसे तो नहीं सीखी बल्कि उसने अपने परिश्रम और लगन से सीखी | उसने तो बस गुरु की प्रतिमा को समक्ष रखके ही तो अभ्यास किया था | फिर क्या हक़ बनता है गुरु द्रोणाचार्य की गुरु दक्षिणा का ? और यदि एकलव्य की महानता के कारण वह गुरुदक्षिणा के लिए कहता भी है फिर क्या आवश्यकता थी उसका अंगूठा माँगने की ? कितने निर्दयी और अन्यायी गुरु थे ..? 

ऐसे ही अनगिनत प्रश्न हमारा मन अक्सर पूछा करता है, परन्तु उनके हल कहाँ मिलते हैं | क्या ये कहानी पूर्णतया सत्य है ?

प्रिय पाठकों, 
हाँ, ये कहानी पूर्णतया सत्य नहीं है | हाँ ...आपको जानकर आश्चर्य अवश्य हुआ होगा | परन्तु सत्यता यही है कि ये कहानी मूढ़ लोगों ने गलत अर्थ तथा गलत व्याख्या के साथ प्रस्तुत की है जिसके परिणामस्वरूप गुरु जैसे पवित्र चरित्र पर दाग लग गया | जरा सोचिये जिस गुरु को सनातन धर्म ने ईश्वर से भी उच्च स्थान दिया फिर भला गुरु ऐसा अन्याय, ऐसा अनर्थ कैसे कर सकता है और यदि ऐसा किया भी होगा तो कोई तो कारण, कोई तो प्रयोजन रहा होगा |  
आज आपको यहाँ मैं उस कहानी का पूर्णसत्य और वास्तविक चित्र प्रस्तुत कर रहा हूँ  |

एकलव्य की कहानी | गुरुद्रोणाचार्य सही या गलत ? | Ekalavya story


गुरुद्रोणाचार्य अपने शिष्यों के साथ आ रहे थे कि उनकी नज़र ऐसे योद्धा पर पड़ी जो धनुर विद्या में निपुण था उसने एक कुत्ते पर बाण चलाया और उसका मुँह खुला रह जाता है परन्तु उसे तनिक भी चोट नहीं पहुँचती है उसकी इस विद्या को देख द्रोणाचार्य ने उस योद्धा से परिचय जानना चाहा | एकलव्य ने गुरु द्रोणाचार्य को देखते ही उनके चरण स्पर्श किये और अपना परिचय दिया | 
द्रोणाचार्य - वत्स, तुम्हारी धनुर्विद्या का दृश्य हम देख चुके हैं, तुम धनुर्विद्या में कुशल योद्धा हो, तुम्हारे गुरु कौन हैं ? तुमने ये विद्या किस्से सीखी ?
एकलव्य - मेरे गुरु तो आप ही है, ये विद्या मैंने आपसे ही तो सीखी है | 
द्रोणाचार्य आश्चर्य से - परन्तु मैंने तो कभी तुम्हे धनुष - बाण के बारे में तक नहीं बताया फिर ..फिर मैंने कैसे ?
एकलव्य - गुरुदेव, मैंने आपको ही अपना गुरुदेव मान लिया और आपकी प्रतिमा को समक्ष रख ये धनुर्विद्या सीखी |
द्रोणाचार्य - इस धनुर्विद्या को सीखने का कोई विशेष प्रयोजन ?
एकलव्य - हाँ, गुरुदेव मैं अपने शत्रु अर्जुन को हराना चाहता हूँ | 
फिर द्रोणाचार्य एकलव्य की मनोदशा समझ गये कि एकलव्य अर्जुन से घृणा करने लगा था और यदि वह एक कुशल धनुर्धर हो गया तब महाभारत के युद्ध में वह अधर्मी कौरवों से सन्धि कर लेगा और अधर्म पर चलेगा | इसी अनर्थ को बचाने के लिए आगे गुरु द्रोणाचार्य ने एकलव्य से कहा | 

एकलव्य तुमने मुझे गुरु मान लिया है तो फिर मेरी गुरु दक्षिणा भी देनी होगी ?
एकलव्य ने प्रसन्नचित्त होकर कहा - जी गुरुदेव, आप कहिये मैं क्या सेवा करूं आपकी और क्या दे सकता हूँ आपको ?
गुरु द्रोणाचार्य - मुझे, वचन दो कि कभी युद्ध क्षेत्र में धनुष को हाथ नहीं लगाओगे ..|
एकलव्य गुरु की बात सुनकर सन्न रह जाता है और बहुत दुखी होता है वह कहता --
"गुरुदेव आपने तो मेरा अंगूठा ही मांग लिया |"

हाँ यह वाक्य एक मुहावरे की तरह है | इसका तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि उन्होंने अंगूठा काट के देने के लिए कहा | परन्तु लोगों ने इसका अर्थ न जाने क्या - क्या लिख दिया | एकलव्य वचन देता है कि वह कभी किसी युद्धक्षेत्र में  धनुष को हाथ नहीं लगाएगा | 

और इस कहानी को पढ़कर सबसे ज्यादा वर्तमान दलित प्रभावित होते हैं, वो कहते हैं कि एकलव्य दलित था इसलिए उसे आगे नहीं बढ़ने दिया जो कि सिर्फ़ और सिर्फ़ असत्य है | 

प्रिय पाठकों, भारतीय संस्कृति का प्रत्येक ग्रन्थ, साहित्य, वेद - पुराण आदि में गूढ़ रहस्य है जिसको समझना जटिल है और अज्ञानतावश कुछ का कुछ अर्थ निकाल लेते हैं | और बाद में ग्रंथो को, पुरानी सभ्यता को दोष देते हैं |  ऐसी ही गूढ़ रहस्य को पढ़ने के लिए हिन्दुस्तानी क्रान्ति का हिस्सा बने रहिये तथा सनातन धर्म का प्रचार करते रहिये | 

हरे कृष्णा हरे कृष्णा 
कृष्णा कृष्णा, हरे हरे 

हरे राम हरे राम 
राम राम, हरे हरे 

Wednesday, January 15, 2020

परम बुध्दिमति महिला | (Lord krishna) | Real devotee meaning

उन्नत अध्यात्म वादियों तथा आत्मा और पदार्थ में अंतर करने में सक्षम विचारकों के हृदय में भक्ति के दिव्य विज्ञान का प्रसार करने के लिए लेते हैं | तो भला फिर हम स्त्रियां  पूर्णरूपेण जान सकती हैं  ?

बड़े-बड़े तत्व ज्ञानी भगवान के धाम तक नहीं पहुंच पाते | उपनिषदों में कहा गया है परम ब्रह्मा बड़े से बड़े दार्शनिक की भी चिंतन शक्ति से परे हैं |  उन्हें बड़ी से बड़ी विद्या बड़े से बड़े मस्तिष्क द्वारा भी नहीं जाना जा सकता | उन्हें वही जान पाता है जिसे उनकी कृपा प्राप्त हो |  अन्य लोग वर्षों तक चिंतन करने के बाद भी उन्हें नहीं जान पाते |  इस तथ्य की पुष्टि महारानी कुंती द्वारा की जा रही है  जो एक अबोध महिला की भूमिका अदा कर रही है |  सामान्य स्त्रियां  दार्शनिकों की तरह चिंतन नहीं कर पाती  किंतु उन्हें भगवान से आशीष प्राप्त रहता है,  क्योंकि वे भगवान की तथा सर्वशक्तिमत्ता पर तुरंत विश्वास कर लेती हैं  और बिना किसी अनुभव के उन्हें नमस्कार करती हैं | भगवान इतने दयालु हैं कि  वे केवल ऐसे व्यक्ति पर कृपा नहीं करते जो बहुत बड़ा दार्शनिक होता है | प्रयोजन की निष्ठा को जानते हैं | यही  कारण है कि किसी भी धार्मिक उत्सव के अवसर पर  महिलाएं बड़ी तादाद में एकत्र होती हैं |  प्रत्येक  देश के प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय में पुरुषों की अपेक्षा  अधिक दिखती है | भगवान की सत्ता की स्वीकृति की यही सरलता निष्ठा विहीन धार्मिक दिखावे से कहीं अधिक प्रभावोत्पादक है |

कुन्ती देवी नहीं बहुत ही विनीत भाव से भगवान की प्रार्थना की जो कि  एक वैष्णव का लक्षण है | भगवान कृष्ण तो कुंती देवी के चरणों की धूल लेकर उनके प्रति आदर जताने आए थे | क्योंकि कृष्ण कुन्ती देवी को अपनी बुआ मानते थे,  अतएव  वे उनका चरण स्पर्श किया करते थे | यद्दपि कुंती देवी कृष्ण की माता यशोदा तुल्य पूजनीय थीं,  किंतु महान भक्त होने के कारण वे इतनी विनीत थी कि, उन्होंने प्रार्थना की, " हे कृष्ण !  तुम तो परमहंसों द्वारा ज्ञय  हो |  मैं तो एक अबला हूं तो भला मैं आपका दर्शन कैसे कर सकती हूं ? "

वैदिक प्रणाली के अनुसार 4 सामाजिक विभाग (वर्ण) हैं |  सामाजिक वर्णों में ब्राह्मण सर्वोपरि है,  क्योंकि वे सर्वाधिक बुद्धिमान हैं |  उसके बाद क्षत्रिय ( सैनिक वर्ग तथा राजन्य),  फिर वैश्य  (कृषक तथा व्यापारी)  और अंत में शूद्र (सामान्य मजदूर) आते हैं |  इस प्रणाली में मनुष्य के गुण तथा कर्म के अनुसार उसका स्थान निर्धारित होता है |  भगवद गीता में  स्त्रियों वैश्यास्त्था शूद्राः और श्रीमद्भागवत् में स्त्रीशुद्रद्विजबंधूनाम का उल्लेख आया है | 

इन निर्देशों के अनुसार स्त्रियां शूद्र तथा द्विजबंधु एक ही श्रेणी में आते हैं |  द्विजबंधु  उस व्यक्ति का सूचक है जो उच्च ब्राह्मण या क्षत्रिय कुल में उत्पन्न तो होता है,  किन्तु उसमे  उसके अपने गुण नहीं पाए जाते |  वैदिक प्रणाली के अनुसार मनुष्य का सामाजिक स्थान उसके गुण द्वारा निर्धारित होता है |  यह अत्यंत व्यावहारिक है | मान लीजिए कि कोई व्यक्ति उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के पुत्र रूप में जन्म लेता है तो इसका अर्थ यह नहीं होता है कि वह भी  उच्च   न्यायालय का न्यायाधीश है |  फिर भी यदि कोई ब्राह्मण कुल में उत्पन्न होता है उसमें कोई गुण नहीं पाए जाते और वह पहले दर्जे का धूर्त होता है तो भी वह अपने को ब्राह्मण कहलवाता है | उसके गुण शूद्र से भी न्यून होते हुए भी लोग उसे ब्राह्मण मानते हैं | इससे वैदिक सभ्यता का पतन हुआ है | 

 भारत में ब्राह्मण लोग कभी-कभी मेरे आंदोलन का विरोध करते हैं, क्योंकि मैं यूरोप तथा अमेरिका के लोगों को प्रशिक्षित करता तथा उन्हें ब्राह्मण मानता हूं  | किंतु हम ना तो उनके तर्कों की परवाह करते हैं, न ही कोई भी विवेक युक्त व्यक्ति करेगा |

पृथिवीते  आछे यत नगरादि ग्राम | 
सर्वत्र प्रचार हैबे मोर नाम | |

विश्व के प्रत्येक नगर प्रत्येक शहर प्रत्येक गांव में कृष्ण भावनामृत आंदोलन का प्रचार होगा |  तो भला यह कैसे हो सकता है  कि यूरोप वासी तथा अमेरिका वासी ब्राह्मण नहीं बनेंगे ?  वस्तुतः जो व्यक्ति कृष्ण भावनामृत अंगीकर करता है वह पहले ही ब्राह्मणत्व  से आगे बढ़ चुका होता है | 

" जो भक्ति योग स्वीकार करता है वह प्रकृति के गुणों को पार कर जाता है और तुरंत ही दिव्य पद को प्राप्त होता है|"   ब्राह्मण बनने की बात क्या,  ऐसा व्यक्ति परम पद को प्राप्त होता है | 

इस अंधविश्वास ने ,  ब्राह्मण कुल में उत्पन्न व्यक्ति ही ब्राह्मण बन सकता है,  वैदिक सभ्यता को मार डाला है, किंतु अब हम इस विचार को पुनर्जीवित कर रहे हैं कि प्रत्येक व्यक्ति सिद्धि प्राप्त कर सकता है  |

" हे पृथा पुत्र  !  जिन लोगों ने मेरी शरण ग्रहण कर रखी है वे भले ही निम्न जन्मा, स्त्रियाँ या शुद्र क्यों न हों,  परमधाम तक पहुंच सकते हैं |"  इस तरह यद्यपि स्त्रियां शुद्र तथा वैश्य निम्न वर्ग के माने जाते हैं किंतु भक्त हो जाने पर वह चाहे स्त्री हो या पुरुष,  ऐसी उपाधियों से परे चले जाते हैं |  सामान्यतया स्त्रियों, शूद्रों  तथा वैश्यों को अल्पज्ञ   माना जाता है | यदि कोई कृष्ण भावना मृत अंगीकार करता है तो वह सर्वाधिक बुद्धिमान बन जाता है |

(Lord krishna) | Real devotee meaning | chanting meaning



हरे कृष्णा हरे कृष्णा 
कृष्णा कृष्णा हरे हरे || 

हरे राम हरे राम 
राम राम हरे हर ||

Thursday, January 9, 2020

इन्द्रियों से परे | Bhagwat geeta | Lord Krishna | Senses meaning

माया जवनिकाच्छ्त्र मज्ञाधोक्षजमव्य्यम |
न लक्ष्यसे मूढ़दृशा नटो नाट्यधरो यथा ||


सीमित इंद्रिय ज्ञान से परे होने के कारण आप ठगिनी शक्ति ( माया ) के परदे से ढके रहने वाले शाश्वत अविनाशी तत्व हैं |  आप मूर्ख दर्शक के लिए उसी तरह लक्ष्य रहते हैं जिस तरह अभिनेता की वेशभूषा बना लेने पर नट ( कलाकार )  पहचान में नहीं आता |

भगवदगीता में भगवान श्री कृष्ण (Lord Krishna) इसकी पुष्टि करते हैं अल्पज्ञ व्यक्ति उन्हें अपने जैसा सामान्य व्यक्ति समझने की भूल कर बैठते हैं और इस तरह भी उनका उपहास करते हैं | श्रीमती कुंती ने भी इसी की पुष्टि यहां की है | अल्पज्ञ व्यक्ति वह है जो भगवान की सत्ता के विरुद्ध उपद्रव मचाते हैं |  ऐसे व्यक्ति असुर कहलाते हैं |  जब भगवान हम लोगों के  बीच  राम,  नरसिंह, वराह या अपने आदि कृष्ण रूप में प्रकट होते हैं तो वे ऐसे अनेक अद्भुत कार्य करते हैं जो मनुष्य के लिए असंभव है | जैसा कि हम श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध में देखेंगे,  भगवान श्रीकृष्ण मानव मात्र के लिए असंभव कार्यों को तभी से करने लगे थे जब वे अपनी माता की गोद में लेटे रहते थे | उन्होंने उस पूतना चुड़ैल का वध किया जो कि उन्हें मार डालने के लिए अपने स्तनों में विष लगा कर आई थी |  भगवान ने बालक की तरह उसका स्तनपान किया और उसके प्राण तक चूस लिए |  इसी तरह उन्होंने गोवर्धन पर्वत को उठा लिया जैसे कोई बच्चा कुकुरमुत्ता को उखाड़ ले |  वृंदावन के वासियों को शरण देने के लिए 7 दिनों तक पर्वत उठाए खड़े रहे |  भगवान के इन गिने-चुने अमानवीय कार्यकलापों का वर्णन पुराणों, इतिहास तथा उपनिषदों में हुआ है |  उन्होंने भगवदगीता के रूप में अद्भुत उपदेश दिया है |  उन्होंने एक नायक, एक गृहस्थ  एक शिक्षक तथा एक त्यागी के रूप में अद्भुत क्षमताओं का प्रदर्शन किया है |  व्यास,  देवल,  असित,  नारद,  मध्व,  शंकर,  रामानुज,  श्री चैतन्य महाप्रभु,  जीव गोस्वामी,  विश्वनाथ चक्रवर्ती,  भक्ति सिद्धांत सरस्वती तथा उस परंपरा के अन्य प्रामाणिक पुरुषों ने उन्हें भगवान के रूप में स्वीकार किया है |  स्वयं भी उन्होंने प्रामाणिक साहित्य में अनेक स्थलों पर अपने को भगवान घोषित किया है |  फिर भी आसुरी मनोवृति वाला एक ऐसा वर्ग है  जो उन्हें परब्रह्मा परमेश्वर के रूप में मानने से हिचकिचाता है |  ऐसा कुछ तो उनकी अल्पज्ञता के कारण है तो कुछ उनकी घोर मूढ़ता के कारण है  जो उनके विगत तथा वर्तमान दुष्कर्म से उत्पन्न होती है  |  ऐसे लोग श्रीकृष्ण को तब भी नहीं पहचान पाए जब वे उनके समक्ष उपस्थित थे |  दूसरी कठिनाई यह है  कि जो लोग अपनी पूर्ण इंद्रियों पर अधिक निर्भर रहते हैं  वे उन्हें परमेश्वर के रूप में अनुभव नहीं कर पाते |  ऐसे व्यक्ति आधुनिक विज्ञानियों जैसे हैं  जो अपने प्रयोगात्मक ज्ञान से हर बात को जानना चाहते हैं |  किंतु अपूर्ण प्रयोगात्मक ज्ञान से परम पुरुष को जान पाना असंभव है |  यहां पर उन्हें अधीक्षक  अर्थात प्रयोगात्मक ज्ञान की परिधि से परे बतलाया गया है |  हमारी सारी इंद्रियां अपूर्ण है |  भले ही हम यह दावा करते हैं कि  हम हर किसी वस्तु को देख सकते हैं  किंतु हमें यह स्वीकार करना होगा  कि हम वस्तुओं को किन्ही ऐसी परिस्थितियों में  ही  देख सकते हैं  जो हमारे वश में नहीं होती |  भगवान इंद्रिय अनुभूती द्वारा देखे जाने से परे हैं |  महारानी कुंती बद्धजीव की और विशेष रूप से अल्पज्ञ स्त्री जाति की इस न्यूनता को स्वीकार करती हैं |  अल्पज्ञ लोगों के लिए मंदिर,  मस्जिद या गिरजा घरों की आवश्यकता होती है  जिससे भगवान की सत्ता को पहचाने और ऐसे पवित्र स्थलों में जाकर भगवान के विषय में अधिकारियों से श्रवण कर सकें |  अल्पज्ञ के लिए आध्यात्मिक जीवन की यह शुरुआत आवश्यक है |  केवल मूर्ख लोग ही इन पूजा स्थलों की जिनकी आवश्यकता जनता में आध्यात्मिक गुणों के स्तर को ऊपर उठाने के लिए होती है,  स्थापना करने का विरोध करते हैं |  अल्पज्ञ के लिए मंदिरों,  मस्जिदों या गिरजा घरों में जाकर भगवान की सत्ता के समक्ष नतमस्तक होना उतना ही लाभप्रद है जितना की भागवत के लिए सक्रिय सेवा द्वारा भगवान का ध्यान करना | 

इन्द्रियों से परे | Bhagwat geeta | Lord Krishna | Senses meaning



हरे कृष्णा हरे कृष्णा 
कृष्णा कृष्णा हरे हरे || 

हरे राम हरे राम 
राम राम हरे हर ||


Tuesday, January 7, 2020

आदि पुरुष | Protoplast meaning | Lord Krishna

नमस्ये पुरुषं त्वाद्यमीश्वरं प्रकृतेः परम |
अल्क्ष्यं सर्वभूतानामन्तर्बहिरवस्थितम ||


"श्रीमती कुंती ने कहा ;  मैं आपको नमस्कार करती हूं  क्योंकि आप आदि पुरुष हैं  और इस भौतिक जगत के गुणों से निसंग रहते हैं |  आप समस्त वस्तुओं के भीतर तथा बाहर स्थित रहते हुए भी सबों  द्वारा अलक्ष्य  हैं |"

श्रीमती कुंती देवी को यह भली-भांति ज्ञात था  की कृष्ण आदि भगवान हैं  भले ही पद रिश्ते में हुए उनके भतीजे लगते थे |  ऐसी प्रबुद्ध महिला अपने भतीजे को नमस्कार करने की गलती नहीं कर सकती थी |  इसलिए उन्होंने भौतिक जगत से परे आदि पुरुष के रूप में संबोधित किया |  यद्यपि सारे जी भी दिव्य हैं,  किंतु वे न  तो आदि जीव हैं न अच्युत हैं |  वे भौतिक  प्रकृति के चंगुल में आ कर नीचे गिर सकते हैं,  किंतु भगवान कभी नहीं गिरते |  इसीलिए वेदों में उन्हें समस्त जीवो में प्रधान कहा गया है (नित्यो नित्यानाम चेतानाश्चेतनानाम ) |  तत्पश्चात उन्हें ईश्वर या नियंता के रूप में संबोधित किया गया है |  चाहे जीव हो या सूर्य,  चंद्र जैसे देवता हों,  कुछ हद तक वे भी  ईश्वर हैं,  लेकिन इनमें से कोई भी परमेश्वर नहीं है |  कृष्णा परमेश्वर या परमात्मा है |   वे  अंतः तथा बाह्यं दोनों में विद्यमान रहते हैं  |  यद्यपि वे श्रीमती कुंती के समक्ष उनके भतीजे के रूप में उपस्थित थे किंतु वे उनके और अन्य सबों के अंतर में भी विद्यमान थे |  भगवान भगवदगीता में कहते हैं " मैं हर एक के हृदय में स्थित हूं और मेरे ही कारण जीव मेरा स्मरण करता है,  विस्मरण करता है,  मुझ से अवगत होता है आदि-आदि |  समस्त वेदों के माध्यम से मैं जाना जाने योग्य हूं क्योंकि मैं ही समस्त वेदों का रचयिता हूं और वेदांत का शिक्षक हूँ |"

महारानी कुंती इसकी पुष्टि कर रही है किस समस्त जीवो के भीतर और बाहर रहते हुए भी भगवान अलक्ष्य हैं |  कहने का भाव यह है कि भगवान सामान्य व्यक्ति के लिए पहेली तुल्य हैं |  महारानी कुंती ने स्वयं अनुभव किया कि भगवान कृष्ण ने उनके समक्ष उपस्थित होते हुए भी उत्तरा के गर्भ में प्रविष्ट होकर अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र आक्रमण से भ्रूण की रक्षा की |  वे स्वयं इस दुविधा में पड़ी हुई थी  कि कृष्ण सर्वव्यापी हैं या अंतर्यामी |  वस्तुतः वे दोनों हैं किंतु  उन्हें छूट है कि  जो लोग उनके शरणागत नहीं है उनके समक्ष वे प्रकट न हों  | यह अवरोधक पर्दा परमेश्वर की माया शक्ति कहलाता है और उपद्रवी जीव की संकुचित दृष्टिकोण  को नियंत्रित करने वाली यही है |  उसकी व्याख्या अध्याय 2 में की गई है


आदि पुरुष | Protoplast meaning | Lord Krishna



Tuesday, October 8, 2019

ऑफिस बॉय से मुख्य न्यायाधीश बनने की अद्भुत रोमांचक यात्रा | Motivational Story

I come from a poor family. I started my career as a class IV employee and the only asset I possess is integrity.
S.H. Kapadia


 यह भारत के उच्चतम न्यायालय के  पूर्व न्यायाधीश श्री एस एच कपाड़िया जी के, जो उन्होंने स्वयं के बारे में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश बीआर कृष्णा अय्यर  को लिखे एक पत्र में लिखे थे |  भारत के 38 वें न्यायाधीश श्री कपाड़िया जी ने अपनी जीवन-यात्रा एक ऑफिस असिस्टेंट की तरह प्रारम्भ की थी | 

उनकी जज बनने की अदम्य,  उत्कट इच्छा थी |  एक निम्न मध्यमवर्गीय पारसी परिवार में जन्मे कपाड़िया जी के पिता एक क्लर्क थे एवं माता गृहणी | पढ़ाई का बोझ उन पर काफी भारी था, इसलिए होमी कपाड़िया को बेहराम जी जीजीभाई (Behramjee Jeejeebhoy) नामक लॉ फर्म पर नौकरी करनी पड़ी | कभी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि यह लड़का कभी भारत के मुख्य न्यायाधीश के पद को भी सुशोभित कर सकता है | 
  
27वर्ष की उम्र में सन 1974 में वे आयकर विभाग में Counsel बने | वर्ष 1991 में बाम्बे हाईकोर्ट में मुख्य न्यायाधीश तथा दिसम्बर 2003  में उच्चतम न्यायालय में जज बनाए गये | 12 मई, 2010 को उन्हें भारत के मुख्य न्यायाधिपति की शपथ राष्ट्रपति द्वारा दिलाई गयी | 
  
न्यायमूर्ति एस एच कपाड़िया ने स्वयं को हर प्रकार के राजनैतिक दबाव से मुक्त रखा है एवं अनेक महत्वपूर्ण निर्णय दिये हैं | इस देश की न्याय प्रणाली में समुचित परिवर्द्धन एवं सुधान हेतु अनेक सफल प्रयास किये हैं  |

ऑफिस बॉय से मुख्य न्यायाधीश बनने की अद्भुत रोमांचक यात्रा | Motivational Story
S.H. Kapadia

Tuesday, June 25, 2019

हाँ. मैं मजदूर हूँ | Best poem | Jyoti Jha

हाँ. मैं मजदूर हूँ
हाँ मैं मजदूर है
दुखी जीवन जीने को मजबूर हूँ।
आधी पेट खाना और आंसू बहाना
यही मेरा दस्तूर है

सबके घर त्योहारों का मौसम है
सबका घर खुशियों से रौशन है
क्यों कि मैं मजदूर हूँ
मेरे घर मे छाया मातम है

एक अन्न को तरसता है
तो दूजा नए कपड़े की रट रटता है
क्यों कि मैं मजदूर हूँ
मेरा दिन तनख्वाह के इंतजार मे हि कटता है।

दिन भर मन से खटता  हूँ
धूप और बारिश की चोट भी सहता हूँ
क्यों कि मैं मजदूर हूँ
बच्चों की मांगे पुरी न कर
सिर्फ आह भर कर रहता हूँ।

बच्चों की मांगे पूरी न कर
रात अंधेरे चोरों सा घर ढुकता हूँ
सूरज से भी पहले काम पर निकलता हूँ।
क्यों कि मैं मजदूर हूँ
दूखियों सा मेरा संसार है।


ज्योहाँ. मैं मजदूर हूँ | Best poem | Jyoti Jha
ज्योति झा






ज्योति झा
शिक्षा-एम.ए (हिन्दी)
साहित्यिक उपलब्धि-विभिन्न साहित्यिक मंच पर काव्य पाठ।
निवास-कोलकाता।

स्वभाव | What is the nature ?

स्वभाव क्या है ? ( What is the nature) क्या यह बदला जा सकता है ? ( Can this be changed? ) किस स्वभाव के व्यक्ति को अच्छा कहा गया है और किसे बुरे की संज्ञा दी गई है ? ( What kind of person is said to be good and what is the name of evil?) अच्छे स्वभाव से क्या - क्या प्राप्त होता है और बुरे स्वभाव से क्या हानियाँ हैं | ( What is achieved by good nature and what are the impairments of bad nature. ) आइये जाने - 

उपदेश से स्वभाव नहीं बदला जा सकता | गर्म किया हुआ पानी फिर शीतल हो जाता है | - पंचतंत्र 

⇨ मैं नरक में जाने से नहीं डरता यदि पुस्तकें मेरे साथ हों, मैं नरक को स्वर्ग बना दूंगा | - लोकमान्य तिलक 

⇨ स्वभाव  इन्सान को जन्म से मिलता है और शिक्षा तथा संगति से उसे सुधारा जा सकता है | - प्रेमचन्द 

⇨  अच्छा स्वभाव शहद की मक्खी की तरह है, प्रत्येक झाडी से शहद ही निकालती है | - बीचर

⇨  जल तो आग की गरमी पाकर ही गरम होता है, उसका अपना स्वभाव तो ठण्डा ही होता है | - कालिदास 

⇨  वैवाहिक जीवन में तो पति-पत्नि का स्वभाव ही जीवन की बुनियाद है | - अज्ञात 

⇨ इस दुनिया में किसी भी व्यक्ति का स्वभाव प्राकृतिक रूप से ऐसा नहीं है जिसे पूर्ण कहा जा सके | उसे आवश्यकता होती है देखभाल की, आत्मसंयम की | - एस. मार्डेन 

⇨ जिसका जो स्वाभाविक गुण है, उसे उससे वंचित करने की क्षमता किसी में भी नहीं होती है | हंस का स्वाभाविक गुण है कि दूध और पानी को अलग कर सकता है | स्वयं विधाता भी इस कार्य में असमर्थ है | हंस के कुपित होने पर विधाता उसका निवास स्थान छीन सकता है किन्तु उसके नीरक्षीर विवेक को बुद्धि को नहीं छीन सकता | - भर्तृहरि 

⇨ कोई व्यक्ति अचानक स्वभाव के विपरीत आचरण करे, तब शंका कीजिये | - प्रेमचन्द

⇨ हमारे स्वभाव का प्रभाव हमारे परिवार के दूसरे किसी  सदस्य की उन्नति या अवनति पर भी पड़ता है | - डी. पाल 

⇨ स्वभाव की उग्रता झगड़े की आग को भड़काती है, परन्तु बिलम्ब से क्रोध करने वाला व्यक्ति अपने मधुर वचन से बुझा देता है | - नीति वचन 

⇨ स्वभाव के अनुसार उन्नति कीजिए, संस्कार स्वयं आपके पास चले आयेंगे | - स्वामी विवेकानन्द

⇨ स्वभाव ही मनुष्य के जीवन का स्वर्ग या नर्क निर्धारित करता है | - डी. बारिया 

⇨ एक चोट को आदमी शीघ्र भूल जाता है लेकिन अपमान को देरी से | - चेस्टर फील्ड 

⇨ बुरे लोगों को निंदा में ही आनन्द आता है | सारे रसों को चखकर भी कौआ गन्दगी से ही तृप्त होता है | - वेदव्यास 

⇨ स्वभाव कच्ची मिट्टी की भांति होता है जिसकी कोई शक्ल नहीं होती इसे आकृति देने की आवश्यकता होती हैं | - संतवाणी 

⇨ जिसका जो स्वभाव है, उसे छुड़ाना कठिन है |  यदि कुत्ता राजा बना दिया जाये, तो क्या वह जूता नहीं चबायेगा | - हितोपदेश

⇨ दया मनुष्य का स्वाभाविक गुण है | - प्रेमचन्द

⇨ व्यक्ति के स्वभाव पर उसका भविष्य निर्भर करता है | - प्रेमचन्द 

⇨ अगल-बगल देख-समझकर व्यवहार करने वाला कभी धोखा नहीं खाता | - चीनी कहावत 

स्वभाव | What is the nature ?
स्वभाव (Nature)